अलग-थलग स्थिति की समस्या
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यह बला प्रायः समाज द्वारा ही इन लोगों पर थोपी जाती है। जिस तालाब से हरिजन पानी पीते हैं, वह इतना गंदा है कि वह नारू कीड़ों का जैसे बसेरा बन गया है। जब यह तालाब बांसवाड़ा के कलक्टर को दिखाया गया तो वह स्तब्ध रह गया और उसने तालाब को तुरंत बंद किए जाने का आदेश दिया।
इसके पास ही एक पक्का कुआं था, जहां जाकर पानी लिया जा सकता था। हिंदुओं से चिरौरी की गई थी कि वे हरिजनों को इस कुएं से पानी लेने दें, लेकिन वे राजी नहीं हुए। कलक्टर ने कहा, ‘यदि आपसे कहा जाए तो क्या आप इस तालाब का पानी पी लेंगे?’ हिंदुओं ने स्वीकार किया कि वह पानी मनुष्य के पीने के लायक नहीं है, फिर भी उन्होंने हरिजनों को पक्के कुएं को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी।
हालात खराब हैं और सबसे अधिक कष् हरिजन भोग रहे हैं। कानून ने अस्पृश्यता को अपराध ठहराया है। लम्बे अर्से से हरिजन सेवक संघ उसे मिटाने के लए जी-तोड़ प्रयास कर रहा है, लेकिन कहा नहीं जा सकता कि देहातों में सवर्ण हिंदुओं के मन-मस्तिष्क में कोई परिवर्तन आया ह। इस संबंध में राज्य-सरकारें कुछ अधिक नहीं कर पाई हैं।
परिशिष् - II
जहां कमीज पहनना अपराध है
दक्षिण भारत में हरिजनों की व्यथा
एक सामाजिक कार्यकर्ता का अनुभव
ले.-स्वामी आनंद तीर्थ, प्रादेशिक अधिकारी,
अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ
‘संडे टाइम्स, 9 मार्च, 1952 से
बड़े खेद की बात है कि पांच वर्ष पूर्व नागरिक असुविधा निवारण संबंधी कानून बन जाने पर भी हमारे गांवों में हरिजनों को अब भी विभिन्न नागरिक असुविधाओं को झेलना पड़ रहा है। मदुरै जिले के मैलूर तालुका में हरिजनों की सामाजिक असुविधाओं को दूर करने के लिए पिछड़े नौ महीने से अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ जोरदार कोशिश कर रहा है। चाय की दुकानों, सैलूनों, कुओं, तालाबों, बाबडि़यों आदि में हरिजनों को जिन अनेक असुविधाओं का