10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विभिन्न स्तरों में परिवर्तन का निर्धारण अभी भी जाति के आधार पर होता है। प्रत्येक हिंदू (यहां इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जा रहा है) जाति में जन्म लेता है, उसकी वह जाति ही उसके धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक जीवन का निर्धारण करती है। यह स्थिति मां की गोद से लेकर मृत्यु की गोद तक रहती है। पश्चिमी देशों में समाज के विभिन्न स्तरों का निर्धारण, चाहे वह आर्थिक हो, शैक्षिक हो, या व्यावसायिक हो, जिन प्रधान तत्वों के द्वारा होता है, वे अदलते-बदलते रहते हैं, वे उदार होते हैं, और उनमें जन्म और वंश की कसौटी को बदलने की प्रवृत्ति होती है। भारत में आध्यात्मिक, सामाजिक, सामुदायिक तथा पैतृक व्यवसाय सबसे बड़े तत्व हैं, जो अन्य तत्वों की अपेक्षा प्रधान तत्व होते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों में जहां जनगणना के समय आर्थिक अथवा व्यावसायिक वर्ग के आधार पर आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, वहां भारत में जनगणना के समय धर्म और जाति का ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रव्यापी और सामाजिक संस्था के रूप में जाति के बारे में कुछ भी क्यों न कहा जाए, इसकी उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं होगा और जब तक समाज में किसी व्यक्ति के अधिकार और उसके पद की पहचान जाति के आधार पर की जाती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हर दस साल बाद होने वाली जनगणना से इस अवांछनीय संस्था के स्थायी होते जाने में सहायता मिलती है।
सन् 1901 की जनगणना के परिणामस्वरूप अस्पृश्यों की कुल जनसंख्या के बारे में कोई सटीक आंकड़े नहीं निकल सके। इसके दो कारण थे। पहला तो यह कि इस जनगणना में कौन अस्पृश्य है और कौन नहीं, इसे निश्चित करने के लिए कोई सटीक कसौटी नहीं अपनाई गई थी। दूसरे यह कि जो जातियां आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई थीं और अस्पृश्य नहीं थीं, उन्हें भी अस्पृश्यों के साथ मिला दिया गया।
सन् 1911 की जनगणना में कुछ आगे काम हुआ और अस्पृश्यों की गणना बाकी लोगों से अलग करने के लिए दस मानदंड अपनाए गए। इन मानदंडों के अनुसार जनसंख्या अधीक्षकों ने उन जातियों और कबीलों की अलग-अलग गणना की, जो -
ब्रा“ाणों की श्रेष्ता को नहीं मानते,
किसी ब्रा“ाण या अन्य मान्यता प्राप्त हिंदू से गुरु-दीक्षा नहीं लेते,
वेदों की सत्ता को नहीं मानते थे।
बड़े-बड़े हिंदू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करते,