2. अस्पृश्य-उनकी संख्या - Page 26

अस्पृश्य - उनकी संख्या

  1. ब्रा“ाण जिनकी यजमानी नहीं करते,

  2. जो किसी ब्रा“ाण को पुरोहित बिल्कुल भी नहीं बनाते,

  3. जो साधारण हिंदू मंदिरों के गर्भ-गृह में भी प्रवेश नहीं कर सकते,

  4. जिनसे छूत लगती है,

  5. जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं, और

  6. जो गोमांस खाते हैं और गाय की पूजा नहीं करते।

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हिंदुओं से अस्पृश्यों को अलग मानने पर मुसलमानों द्वारा सरकार को 27 जनवरी, 1910 को प्रस्तुत किए अपने एक ज्ञापन में इस पर बल दिया गया कि उन्हें भारत की राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व हिंदुओं की कुल जनसंख्या के अनुपात में न देकर उन हिंदुओं की जनसंख्या के अनुपात में दिया जाए जो स्पृश्य होते हैं, क्योंकि उनका यह तर्क था कि जो अस्पृश्य हैं, वे हिंदू नहीं हैं।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि 1911 की जनगणना से अस्पृश्यों की संख्या के निर्धारण की शुरुआत हुई। 1921 और 1931 की जनगणना में भी इन हिदायतों के अनुपालन की कोशिश जारी रखी गई।

साइमन कमीशन जो 1930 में भारत आया था, इन्हीं कोशिशों के परिणामस्वरूप कुछ-कुछ निश्चयपूर्वक यह बता सका कि ब्रिटिश भारत में अस्पृश्यों की जनसंख्या चार करोड़ 4.5 लाख है।

किंतु 1932 में जब लोथियन समिति पुनर्गठित विधान सभा के लए मताधि कार के प्रश्न पर विचार करने के लिए भारत आई और उसने जांच करनी शुरू की तब हिंदुओं ने अचानक अपने तेवर बदल दिए और भारत में अस्पृश्यों की संख्या के बारे में जो आंकड़े साइमन कमीशन ने दिए थे उनको भारत में अस्पृश्यों की जनसंख्या के बारे में सही आंकड़ों के रूप में मानने से इंकार कर दिया। कुछ प्रांतों में तो हिंदुओं ने यहां तक कहा कि उनके प्रांत में कोई अस्पृश्य है ही नहीं। इसका कारण यह था कि तब तक हिंदुओं को अस्पृश्यों की स्थिति को खुले आम स्वीकार करने के खतरे का अहसास हो चुका था, क्योंकि इसका मतलब यह था कि हिंदुओं को जनसंख्या के आधार पर विध ान सभा में जितना प्रतिनिधत्व मिला हुआ था, उसका कुछ अंश उनसे छिनकर अस्पृश्यों को मिल जाएगा।

सन् 1941 की जनगणना पर विचार करना व्यर्थ है, क्योंकि यह जनगणना युद्ध-काल में की गई और एक प्रकार से यह अनुमानित ही थी।