3. गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्तियों को नकलनवीसों, रीडरों और लिपिकों

की आवश्यकता होती थी। ऐसे लोग स्वाभाविक रूप से भाषा वैज्ञानिक

भी होते थे। एक पुस्तक विक्रेता का दावा है कि वह लैटिन और ग्रीक

साहित्य का विद्वान है। आशुलिपिकों की भरमार थी। निजी और सार्वजनिक

पुस्तकालयों में लायब्रेरियन होते थे। शासन में आशुलिपि की सहायता लेना

साधारण बात थी और गुलाम नाजिरों को नियमित नौकरियां मिलती थीं।

एक विशेष शोध-प्रबंध में स्नेटोनियस ने बहुत से मुक्त गुलाम शास्त्रकारों

और वैश्याकरणिकों का उल्लेख किया है। आस्टस के पोते का अध्यापक

वैरीअस फलाकस था, और उसकी मृत्यु हो जाने पर उसकी मूर्ति हो जाने

पर उसकी मूर्ति लगाकर उसका सार्वजनिक रूप से सम्मान किया गया।

स्क्रीबोनियस एफ्रोडीसियस एक गुलाम था। वह ओरबीलियस का शिष्य

था, जो बाद में स्क्रीबेनिया द्वारा आजाद कर दिया गया था। हाईजीनियस,

पैलेटाइन पुस्तकालय का लायब्रेरियन था। इस कार्यालय में उसके पश्चात

उसी के द्वारा आजाद किए गए जूलियस मोडेसटस नामक गुलाम को

नियुक्त किया गया। हमें एक गुलाम दार्शनिक का भी पता चलता है,

जिसके अनेक मुक्त किए गए गुलाम इतिहासकार होते थे। इस दार्शनिक

को अपने मालिक, गुलामों के दोस्तों, और मुक्त हुए गुलाम वास्तुकारों के

साथ बहस के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। शिलालेखों में मुक्त किए

ऐसे गुलामों का बार-बार उल्लेख मिलता है, जो डाक्टर होते थे। इनमें से

कुछ विशेषज्ञ भी थे। जैसा कि एक या दो उदाहरणों से पता चलता है,

इनका प्रशिक्षण बड़े-बड़े घरानों में गुलाम के रूप में हुआ। ये कुछ दिन

पश्चात प्रख्यात हो गए और मोटी फीस लेने के लिए बदनाम हो गए।

समाज के कुछ वर्गों द्वारा नर्तकों, गायकों, संगीतकारों, खेलकूद प्रशिक्षकों आदि की मांग हुई। गुलामों में इस कोटि के लोग भी हुए। इनमें से कुछ को शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षित भी किया गया और उन्होंने ख्याति अर्जित की। ख्1,

आगस्टस के समय में वाणिज्य और उद्योगों का विस्तार हुआ। इससे पहले भी गुलामों को (कला और शिल्प) के कार्यों में लगाया जाता था। परंतु व्यापार में अचानक वृद्धि हो गई, अन्यथा उन्हें अधिक संख्या में रखना व्यर्थ होता। रोम निवासी और भी खुलकर विभिन्न व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों में लग गए। चूंकि व्यापारिक गतिविधियां और अधिक बड़े पैमाने पर होने लगीं और

  1. ‘स्लेवरी इन रोमन एम्पाय’ पृ. 63