गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता
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दलालों का महत्व और अधिक बढ़ गया, तो भी ये दलाल वही होते थे जो गुलाम थे। यह इस कारण था कि गुलामों की शर्तें लचीली होती थीं। यह इसलिए भी लचीली होती थीं कि जिससे किसी भी गुलाम को यह लालच दिया जा सके कि धन और स्वतंत्रता की आशा से कार्य करे और उनमें इतनी बंदिश भी रहे कि जिससे गुलाम द्वारा अपने मालिक को अपने दुर्व्यवहार के कारण हुए नुकसान की भरपाई करने की गारंटी भी रहे। व्यापार में किसी गुलाम और उसके मालिक अथवा अन्य व्यक्ति के बीच व्यावसायिक शर्तें आम बात थी और इस प्रकार किया गया कार्य निस्संदेह बहुत लाभकारी था। ...गुलामों को भूमि किराए पर देने की प्रथा का ऊपर जिक्र किया जा चुका है ...और यह प्रणाली उद्योगों में कई रूपों में प्रचलित थी। मालिक किसी भी गुलाम को अपने बैंक या जहाज के उपयोग की इजाजत दे सकता था, लेकिन शर्त यह होती थी कि वह उसे इसके बदले में निश्चित राशि या कमीशन देगा। ख्1,
ये गुलाम जो कुछ कमाते, वह कानून की दृषि् में उनकी संपत्ति बन गई और जिसे वे विभिन्न प्रयोजनों पर खर्च कर सकते थे। निस्संदेह अधिकांश मामलों में यह धनराशि या तो भोजन पर खर्च होती या आमोद-प्रमोद पर खर्च होती। यह संपत्ति कोई थोड़ी बचत नहीं होती थी जिसे वह कभी-कभी कमाते और मौज-मस्ती के लिए उड़ा देते हो। जो गुलाम अपने मालिक के कारोबार को इस लायक बना देते कि उससे लाभ होने लगे और उन्हें खुद भी लाभ हो, वे यह भी कोशिश करते कि उन्होंने जो कुछ खर्च कर दिया है उसकी भरपाई भी हो जाए। वह अपनी इस अतिरिक्त आय को अपने मालिक के कारोबार में या उससे भिन्न किसी दूसरे कारोबार में फिर से लगा देते। वह अपने मालिक के साथ व्यापारिक संबंध रखते और मालिक उन्हें बराबर का हिस्सेदार मान लेते या वे किसी के साथ करार करते। वह अपनी संपत्ति अथवा अपने कारोबार के इंतजाम के लिए मुख्तार भी रख लेते और इस प्रकार उनकी संपत्ति केवल भूमि, भवन, दुकानें ही नहीं होती थीं, बल्कि अधिकार-पत्र और दावे भी होते थे।
व्यापार में लगे गुलामों के अनगिनत कारोबार होते, उनमें से बहुत से दुकानदार होते जो खाने की तरह-तरह की सामग्री बेचते जैसे रोटी, मांस, नमक, मछली, शराब, सब्जियां, फल, शहद, दही, बत्तखें और ताजा मछलियां आदि। कुछ गुलाम कपड़े, चप्पलें, जूते, गाउन और मेंटल आदि बेचते थे। रोम में सर्कस मामीमस या पोर्टिकस ट्रिगमिमस या इसक्विलाइन मार्केट या दि ग्रेट मार्ट (कैओलिन पहाड़ी पर
- ‘स्लेवरी इन रोमन एम्पाय’ पृ. 101-102