18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्थित) या सुबर्रा नामक स्थानों पर इनकी दुकानें थीं। ख्1,
पोम्पेई में सैसीलियस जुकुंडस के घर पर जो रसीदें मिलीं, उनसे यह स्पष् पता चलता है कि ये गुलाम कितनी अधिक संख्या में अपने-अपने मालिकों के यहां मुख्तार और एजेंटों के रूप में काम किया करते थे। ख्2,
यह बात कोई आश्चर्यजनक नहीं लगती कि राज्य के अधीन भी गुलाम हुआ करते थे। आखिरकार युद्ध करना तो राज्य का ही कार्य था और इससे जो बंदी बनाए जाते, वह राज्य की ही तो संपत्ति होती थी। आश्चर्यजनक तो यह है कि राज्य में इन गुलामों से बड़े-बड़े काम लिए जाते और यह कि इन्हें समाज में विशेष पद प्राप्त थे।
किसी साम्राज्य के लिए ‘राज्य का गुलाम’ शब्द का अर्थ यह होने लगा कि वह गुलाम राज्य में शासन के विभिन्न पदों में से किसी पद पर नियुक्त है, उसका एक निश्चित कर्त्तव्य है तथा समाज में प्रायः उसकी एक प्रतिष है। राज्य के गुलाम, नगर के गुलाम और सीजर के गुलाम से क्रमशः ऐसे कर्मचारियों का बोध होने लगा, जैसे कि आजकल सिविल सेवाओं के उच्च और समस्त अवर पद या नगर निगम में कार्यरत कार्मिक होते हैं। (कोषागार के) अधीनस्थ अनेक लिपिक और वित्तीय अधिकारी काम करते थे। इनमें सभी मुक्त गुलाम होते थे। ये लोग जो व्यवसाय करते, उसका क्षेत्र व्यापक होता... जैसे टकसाल... यहां इसका प्रधान कोई सामंत होता, जो सारी टकसाल का अधिकारी होता था... इसके अधीन एक मुक्त गुलाम होता और उसके अधीन अनेक मुक्त गुलाम और गुलाम होते थे। लेकिन कुछ विशेष संकट के समय एक या दो अवसरों को छोड़कर इन गुलामों को एक कार्य से बिल्कुल अलग रखा जाता था। उन्हें सेना में शामिल होकर युद्ध करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि ये इस सम्माननीय कार्य के योग्य नहीं समझे जाते थे। हो सकता है कि इसके अन्य कारण भी हों, अधिक संख्या में गुलामों का शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का विधिवत प्रशिक्षण खतरनाक प्रयोग हो सकता था। अगर इन्हें सेना में रखा भी लिया जाता, तो इन्हें युद्ध करने बहुत कम भेजा जाता और इन्हें नियमित रूप से सेना के हरावल में रखा जाता था, जहां ये भारी संख्या में सेवक के रूप में काम करते और इनसे रसद पहुंचाने की ढुलाई करने का काम लिया जाता था। नावों के बेड़ों में गुलाम काफी संख्या में होते थे। ख्3,
‘स्लेवरी इन रोमन एम्पाय’ पृ. 105
वही, पृ. 106
वही, पृ. 130-47