52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसका कोई नतीजा नहीं निकला था। इस साल स्थानीय दलित संघ ने यह फैसला
कर रखा था कि यदि मंदिर के द्वार उनके लिए नहीं खोले गए तो वे सत्याग्रह
करेंगे। जब हिंदुओं को इस बात का पता चला तो उन्होंने हरिजनों की इस चाल
को विफल करने के लिए योजनाएं बनानी शुरू कर दीं। अंत में जन्माष्मी की
रात को हरिजनों ने जुलूस निकाला और मंदिर में घुसने की कोशिश की। लेकिन
पुजारियों ने उन्हें प्रवेश करने से रोक दिया और कहा, आप लोग यदि भगवान
के दर्शन करना चाहते हैं, तो सड़क पर से करें। इस पर मंदिर के सामने भारी
भीड़ जमा हो गई। पुजारियों ने मंदिर में घुसने की कोशिश की और दोनों पक्षों
के बीच झगड़ा शुरू हो गया और जमकर मार-पीट हुई।’’
हिंदू अपने मंदिरों में अस्पृश्यों को अंदर नहीं आने देते। यह सोचा गया होगा कि वे अस्पृश्यों को अपने मंदिर बनाने और उनमें भगवान की मूर्ति रखने देंगे। यह सोचना गलत है। हिंदू इसकी भी अनुमति नहीं देते। इस संबंध में दो घटनाओं के उदाहरण देना पर्याप्त होगा। उनमें से एक घटना 12 फरवरी, 1923 के ‘प्रताप’ में छपी हैः
‘‘आगरा के एक चमार ने किसी ब्राह्मण को उसके घर में विष्णु की मूर्ति
की पूजा करते हुए देख अपने घर में भी ऐसा ही किया। जब ब्राह्मण को
इसका पता चला तो वह गुस्से से लाल-पीला हो उठा। उसने बहुत से गांव
वालों की सहायता से अभागे हरिजन को पकड़ उसकी जमकर पिटाई की
और कहा, ‘तुझे भगवान विष्णु की पूजा करने की हिम्मत कैसे हुई? इसके
बाद उन्होंने उसके मुंह में कीचड़ भरकर छोड़ दिया। चमान ने हताश होकर
हिंदू धर्म त्याग दिया और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।’’
दूसरी घटना 4 जुलाई, 1939 के ‘हिंदू’ में छपी हैः
‘‘बेलारी जिला हरिजन सलाहकार बोर्ड की बैठक 29 जून 1939 को
कमेटी के प्रधान तथा जिलाधीश के बंगले पर हुई।’ श्री ए. डी. क्रौम्बी, सी.
आई. ई, आई. सी. एस., जिलाधीश ने इसकी अध्यक्षता की।
नारायण देवरकरी के हरिजनों की शिकायतों के संबंध में, जिनमें एक शिकायत
यह भी थी कि महाजन लोग उनसे जबरदस्ती बेगार कराते और उन्हें सताते हैं,
समिति ने यह निर्णय किया कि इस बारे में सरकारी रिपोर्ट मांगी जाए, ताकि
आवश्यक होने पर कोई कार्रवाई की जा सके।
कुडाथिनी गांव के हरिजनों की धार्मिक कठिनाइयों के बारे में समिति को
ब्यौरा दिया गया। इसमें यह आरोप था कि हरिजनों ने हालांकि अपनी कालोनी