अस्पृश्यता और अन्याय
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में बारह साल पहले मंदिर बनाया था, पर वे उसमें कुछ सवर्ण हिंदुओं की
इस आपत्ति के कारण भगवान की मूर्ति स्थापित नहीं कर सके हैं, हालांकि
जो मंदिर में ही बनी हुई रखी है, कि वे मूर्ति स्थापित करने के पहले उसे
गांव में जुलूस के रूप में नहीं ले जा सकते।’’
II
हिंदुओं के कुएं से पानी लेने पर हिंदू कैसा व्यवहार करते हैं, यह निम्नलिखित घटनाओं से स्पष् हो जाएगा।
पहली घटना ‘प्रताप’ के 12 फरवरी, 1923 के अंक में छपी हैः
‘‘महाशय छेदी लालजी ने खबर दी है कि एक चमार मूर्ति की पूजा करने
के लिए जा रहा था। रासते में उसे प्यास लगी। उसने अपनी लोहे की छोटी
डोलची कुएं में डालकर पानी लिया। इस पर एक सवर्ण हिंदू ने उसे डांटा,
खूब मारा-पीटा और एक कोठरी में बंद कर दिया। जब यह घटना हो चुकी,
तब मैं उधर से निकला। मैंने पूछा कि इस आदमी को कोठरी में बंद क्यों
रखा है, तो दीवान साहब ने बताया कि इस आदमी ने अपनी डोलची हमारे
कुएं में डाल दी और यह हमारा धर्म भ्रष् करना चाहता है।’’
यह एक सच्चाई है कि हरिजनों पर अत्याचार करने में हिंदू औरतें भी पीछे नहीं रहतीं, और जो अस्पृश्य हिंदुओं के कुएं से पानी लेने का दुस्साहस करता है उसे मारने-पीटने में वे मर्दों का साथ देती हैं। इस खबर की तुलना कीजिए जो 26 फरवरी, 1932 के ‘प्रताप’ में छपी हैः
‘‘19 फरवरी, 1932 को पुल बजुवां में एक दुखद घटना घटी। यह घटना
तब घटी, जब महाशय रामलाल एक कुएं से पानी लेने गए। यह वही कुआं
था, जिस पर 13 जनवरी, 1932 को कुछ राजपूतों ने महाशय रामलाल और
उनके एक साथी पंडित बंशीलाल की ठुकाई की थी। उस वक्त राजपूत औरतों
का एक झुंड लाठी-डंडे लेकर वहां आ पहुंचा और महाशय की ऐसी पिटाई
की, जिसका बयान नहीं किया जा सकता। राजपूत औरतों ने उन्हें इतना पीटा
कि उनका शरीर लहूलुहान हो गया। इस समय वह फुकलियां के अस्पताल
में भर्ती है।’’
कुएं से पानी भरने के अस्पृश्यों के अधिकार के अनुसार यदि इन कुओं से अस्पृश्य पानी भरना चाहें, तो इस बारे में सरकारी अफसर की मदद भी उन्हें पीटने से नहीं बचा सकती। यह निम्नलिखित घटना से स्पष् है, जिसकी खबर ‘मिलाप’ के 7 जून, 1924 के अंक में इस प्रकार छपी हैः