60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की, बल्कि उन्होंने हरिजनों का जीना दूभर कर देने का षड्यंत्र रच रखा है। उन्होंने अस्पृश्यों को मजदूरी पर रखने से मना कर दिया है। उन्होंने अस्पृश्यों को खाने का सामान बेचने से भी मना कर दिया है। वे अस्पृश्यों के मवेशियों को चरने देने से रोकने लग गए हैं और जब-तब मौका पाकर अस्पृश्य औरतों और आदमियों को मारने-पीटने लगे हैं। यही नहीं, उन्होंने गुस्से में उस कुएं में मिट्टी का तेल भी डाल दिया, जिससे अस्पृश्य अपने पीने के लिए पानी लिया करते हैं। ऐसा उन्होंने कई दिनों तक किया। इसका नतीजा यह हुआ कि अस्पृश्य पीने के पानी के लिए तरसने लगे। जब नौबत यहां तक पहुंच गई तो उन्होंने सोचा कि इस बारे में क्यों न मजिस्ट्रेट के यहां फौजदारी का मामला दायर कर दिया जाए। उन्होंने यह मुकदमा 17 अक्टूबर को दायर कर दिया। यह मुकदमा कुछ सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ दायर किया गया है।’’
‘‘इस मामले में सबसे अजीब पक्ष श्री गांधी और उनके सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका का है। श्री गांधी ने यह पूरी घटना जानते हुए कि सवर्ण जाति के लोगों ने कवीथा गांव के अस्पृश्यों पर क्या-क्या अत्याचार और जुल्म किए अस्पृश्यों को केवल यही सलाह देना ही काफी समझा कि वे गांव को छोड़ दें। उन्होंने इन बदमाशों पर अदालत में मुकदमा दायर करने की सलाह तक नहीं दी। उनके सहयोगी श्री वल्लभभाई पटेल ने जो भूमिका अदा की वह तो और भी ज्यादा अजीब थी। वह सवर्ण हिंदुओं को यह समझाने कवीथा गए कि वे अस्पृश्यों पर जुल्म न करें। पर उन्होंने पटेल की एक न सुनी। इसके बावजूद इस व्यक्ति ने अस्पृश्यों की इस बात का विरोध किया कि उन लोगों पर मुकदमा दायर किया जाए और अदालत से उन्हें सजा दिलवाई जाए। उनके इस विरोध के बावजूद अस्पृश्यों ने शिकायत दर्ज कराई। लेकिन उन्होंने अस्पृश्यों पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वे सवर्ण हिंदुओं के विरुद्ध की गई इस शिकायत को उनके द्वारा यह भरोसा दिलाने पर वापस ले लें कि वे उन पर अब आगे ज्यादती नहीं करेंगे। लेकिन अस्पृश्य इस समझौते को कभी भी लागू नहीं करा सके। अस्पृश्यों ने अत्याचार को भोगा और श्री गांधी के मित्र श्री वल्लभभाई पटेल की सहायता से अत्याचारी साफ-साफ बच गए।’’