6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 77

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानने वाले थे। उन्होंने भंगियों से कहा कि ‘चाहे तुम हिंदू हो या मुसलमान,

तुम अपने मुर्दे को गाड़ों, और अगर ऐसा नहीं किया तो हम ही तुम्हारे मुर्दे

को जमीन में गाड़ देंगे।’ इस तरह धमकियां दी गईं, तो मारपीट के डर से

उन्होंने अपना मुर्दा जमीन में गाड़ दिया।’’

यहां सिर्फ इतनी-सी बात नहीं है। यहां एक और बात भी ध्यान देने की है। सवर्ण हिंदू अपने मुर्दों का संस्कार जलाकर करते हैं। चूंकि हिंदुओं के रीति-रिवाजों का जो उनकी श्रेष्ता के प्रतीक हैं, अनुकरण करना अस्पृश्यों की उद्दंडता है, इसलिए उन्हें अपने शवों का संस्कार जमीन में गाड़कर ही करना चाहिए, चाहे वे इसे चाहें या न चाहें।

अनिवार्य रूप से जमीन में गाड़कर शव का संस्कार करने की एक घटना का समाचार 6 जून, 1924 ‘मिलाप’ में इस प्रकार छपा हैः

‘‘अस्पृश्यों में जागृति का मुख्य कारण हिंदुओं के द्वारा उन पर किया

जा रहा अत्याचार है। मैं इस बात से अवगत नहीं था, लेकिन मुझे विभिन्न

कार्यकर्ताओं से जो समाचार मिले हैं, उनसे मुझे बड़ा कष् हुआ है। एक स्थान

से मुझे यह सूचना मिली कि अस्पृश्यों को अपने मुर्दे तक नहीं जलाने दिए

जाते। ऐसा लगता है कि इससे वहां के भंगियों में एक नई प्रथा शुरू हो गई

है। अब उन्होंने मुर्दे को जमीन में शायद इस कारण सिर के बल गाड़ना शुरू

कर दिया है कि जिससे उनमें और दूसरों में अंतर रहे, जो आमतौर पर मुर्दे

को चित लिटाकर गाड़ते हैं। भंगी सोचते हैं कि अगर वे दूसरों की नकल

करेंगे, तो उनके लिए अपमानजनक होगा।’’

V

यज्ञोपवीत पहनना कुलीन होने की निशानी है। अस्पृश्यों ने भी अपने को कुलीन कहलाने के विचार से यज्ञोपवीत पहनना शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश के गढ़वाल जिले के रिंगवाड़ी गांव के सवर्ण हिंदुओं द्वारा अस्पृश्यों पर किए गए अत्याचार का समाचार 6 जून के ‘नेशनल हेराल्ड’ में छपा, जो इस प्रकार हैः

‘‘गढ़वाल में चांदकोट में हरिजनों के दस परिवार, जिनमें कुल मिलाकर

तैंतीस लोग हैं, सवर्ण हिंदुओं द्वारा सताए जाने पर लगभग दो महीने तक

इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहने के बाद वहां के जिलाधिकारियों की सहायता

से अपने गांव रिंगवाड़ी वापस आ गए। याद होगा कि इन लोगों ने महात्मा