6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 78

अस्पृश्यता और अन्याय

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गांधी और स्वामी श्रद्धानंद के अछूतोद्धार आंदोलन से प्रेरित होकर जनेऊ पहन लिए थे और रोजना संध्योपासना करनी शुरू कर दी थी। लेकिन गढ़वाल के सवर्ण हिंदुओं को यह सहन नहीं हुआ, क्योंकि उनका कहना था कि यह उनके विशेषाधिकारों के लिए एक चुनौती स्वरूप है। उन्होंने हरिजनों को सताना व उनका सामाजिक बहिष्कार करना शुरू कर दिया। उनसे कहा गया कि वे अपनी बरातों में डोली और पालकी का इस्तेमाल न करें।’’

‘‘एक जगह चार हरिजनों को पकड़ कर उनसे जबरदस्ती एक भैंसा कटवाया गया और उन्हें उसका गोश्त खाने के लिए कहा गया। रिंगवाड़ी में इस तरह का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया, जब इन हरिजनों के लिए सभी झरने, जानवरों के चरने की जगहों आदि पर रोक लगा दी गई, जो सवर्ण हिंदुओं की बात मानने के लिए तैयार नहीं थे। इसके परिणामस्वरूप ही उक्त दस परिवारों को अधिक अत्याचार के डर से अपना गांव अंधेरी रात में छोड़ना पड़ा था।’’

इसी तरह की और भी घटनाएं निम्नलिखित हैंः

‘‘कुछ आर्य समाजियों ने कुछ अस्पृश्यों को ऊंची जाति का बनाने की कोशिश की और उन्हें पहनने के लिए ऊंची जाति का प्रतीक, अर्थात् जनेऊ दिया। लेकिन अधिकांश सनातनियों को यह भी बर्दाश्त नहीं हुआ क्योंकि उनके धर्म में अस्पृश्यों के लिए जनेऊ पहनने की इजाजत नहीं थी। इसीलिए सवर्ण हिंदू उन अस्पृश्यों पर अत्याचार करने लगे हैं, जो जनेऊ पहनते हैं।’’

‘‘आर्य समाजियों ने जम्मू राज्य के मीरपुर जिले के मोइला गांव में भगत हरिचंद की शुद्धि की और उसे जनेऊ पहनने के लिए दिया। वहां के हिंदू जाटों ने उसे सताना शुरू कर दिया और उससे जनेऊ उतारने के लिए कहा। लेकिन हरिचंद अपने धर्म पर अड़ा रहा। अंत में एक दिन जब भगत हरिचंद ने गायत्री पाठ समाप्त किया तो जाटों ने उसकी पकड़ लिया और उसकी बुरी तरह से पिटाई की तथा जनेऊ तोड़कर फेंक दिया। इसका कारण यह था कि शुद्ध होने से पहले वे (शुद्धमेघ) जाटों को गरीब नवाज कहा करते थे, लेकिन बाद में उनसे ‘नमस्ते’ करने लगे थे।’’

चौदह सितंबर 1929 के ‘आर्य गजट’ सेः

‘‘गुरदासपुर जिले में बरहमपुर कस्बे के पास रमानी गांव के हिंदू राजपूतों ने अपने गांव के अस्पृश्यों को उनके घरों से बुलाया और कहा कि वे अपने-अपने