6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं यहां कुछ अन्यायपूर्ण रीति-रिवाजों का उल्लेख कर रहा हूं, जो आज भी राज्य में प्रचलित हैं और जिनहें दूर करने के लिए राज्य की ओर से कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। ये रीति-रिवाज निम्नलिखित हैंः

  1. हरिजन अपनी मर्जी के कपड़े नहीं पहन सकते। उन्हें सदियों पुराने ढंग के कपड़े पहनने होते हैं। कपड़े पहनने के बारे में उनकी पसंद का कोई महत्व नहीं।

  2. शादियों की दावतों में क्या खाना बने, वे यह भी तय नहीं कर सकते। रुपया-पैसा खर्च करने के बावजूद वे अच्छा सामान नहीं बनवा सकते।

  3. वे गांव में किसी सवारी पर होकर चढ़कर नहीं चल सकते।

  4. वे सार्वजनिक वाहनों में नहीं चल सकते।

  5. वे किसी पर्व के अवसर पर अपने देवी-देवताओं का जुलूस निर्दिष् मार्गों को छोड़कर अन्य मार्गों से नहीं निकाल सकते।

  6. वे कुओं पर नहीं चढ़ सकते और न मंदिरों में ही जा सकते हैं।’’ लेखक आगे कहते हैंः

‘‘मैं तीन साल पहले ठक्कर बापा के साथ पूरे राज्य में घूमा था और इस समय मैंने जो कुछ वहां देखा, उसके बारे में मैंने सरकार तथा जनता को अपनी रिपोर्ट दी थी। मैंने सुधार के लिए कुछ उपाय भी सुझाए थे। मैं इस ज्ञापन और दूसरी रिपोर्ट को देखकर जो मुझे भेजी गई हैं, इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पिछले कुछ वर्षों में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है और स्थिति लगभग वैसी ही बनी हुई है।

यह बड़े ही दुख की बात है कि इतने समय बाद भी हम कुछ भी नहीं बदल सके हैं। नतीजा यह है कि सदियों पुराने हमारे रीति-रिवाज और धारणाएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। इस विकृति ने हमें अंधा बना रखा है। हम अत्याचार और अन्याय को नहीं देख पाते, और न उस क्षति का अनुभव कर पाते हैं, जिसने हमें खोखला बना दिया है। अगर साधारण जनता की आंखें उसके अज्ञान के कारण नहीं खुलतीं तब इस सदी की जागरूक सरकारों को अपने उत्तरदायित्व के प्रति अधिक जागरूक होना पड़ेगा।’’ इन कथनों की तारीखें महत्वपूर्ण हैं। ये वर्ष 1945 की हैं। अब यह कोई नहीं कह सकता कि यह हिंदू समाज-व्यवस्था पुराने जमाने की बात है। इस बात से कि यह तो भारत के राज्यों का विवरण है, यह आशय नहीं लिया जाना चाहिए