अस्पृश्यता और अन्याय
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बने नियमों की यह कहानी अब पुरानी पड़ चुकी है। यह एक गलत बात है। यह स्थापित व्यवस्था और उसके तहत बने नियम आज भी बरकरार हैं, जैसे कि वे उस समय थे, जब उनकी रचना की गई थी। इसकी पुषि् अस्पृश्यों की दशा के बारे में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में छपे निम्नलिखित दो वक्तव्यों से हो जाएगी। पहला वक्तव्य उदयपुर के विद्या भवन नामक स्कूल के हैडमास्टर केसरीलालजी बोर्डिया का है, जो उक्त पत्र के 8 मार्च, 1945 के अंक में छपा है। उसमें कहा गया हैः
‘‘मेवाड़ में हरिजनों पर बहुत सारी बंदिशें लगी हुई हैं। वे मंदिरों में नहीं
घुस सकते और न ही सार्वजनिक कुओं से पानी ले सकते हैं। त्यौहारों में
और जुलूस में सवर्ण हिंदुओं के साथ नहीं चल सकते। वे अपनी रथयात्रा या
झांकियां उन रास्तों से या उन दिनों नहीं निकालेंगे जब हिंदू निकालते हैं, वे
गांव से किसी सवारी पर होकर नहीं गुजर सकते।
सोने की ही नहीं, बल्कि अगर वे चांदी के जेवर भी पहन लेते हैं तो
सवर्ण हिंदू एतराज करते हैं। नतीजा यह है कि उन्हें कांसे या पीतल के जेवर
पहनने पड़ते हैं। चूंकि यह सदियों से चला आ रहा है, इसलिए वे शादी की
दावत में घी और गुड़ का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हरिजन बच्चे सवर्ण हिंदुओं के
बच्चों के साथ नहीं बैठ सकते। जिस दिन सकूल का निरीक्षण होता है उस
दिन उन्हें स्कूल न आने को कहा जाता है, ताकि इंस्पेक्टर को कोई असुविधा
न हो।
यहां की सरकार को एक ज्ञापन दिया गया है, जिसमें यह अनुरोध किया
गया है कि अगर वह इन प्रतिबंधों के बारे में अपनी असहमति स्पष् शब्दों में
घोषित कर दे, तब इससे उन गैर-सरकारी संस्थाओं के हाथ मजबूत होंगे, जो
अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष कर रही हैं।
दूसरा वक्तव्य हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष का है, जो मेवाड़ में अस्पृश्यों की दशा के बारे में है। इसमें कहा गया हैः
मेवाड़ हरिजन सेवक संघ ने मेवाड़ सरकार को उसका ध्यान मेवाड़ राज्य
में हरिजनों पर प्रतिबंधों और उनके फलस्वरूप उनकी कठिनाइयों की ओर
आकृष् करते हुए एक ज्ञापन दिया है। इस ज्ञापन में यह बताया गया
है कि सवर्ण हिंदुओं की कट्टरता और जातीय विद्वेष के कारण हरिजनों के
नागरिक अधिकार किस प्रकार समाप्त किए गए हैं।