6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 97

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

को दोषी पाया गया और उन्हें तीन-तीन साल की कैद की सजा सुनाई गई। मजिस्ट्रेट ने जो सजा दी, उच्च न्यायालय ने उसे बहाल कर दिया।

‘इंडियन न्यूज क्रोनिकल’ के 31 अगस्त, 1950 के अंक में निम्नलिखित समाचार छपा हैः

पेप्सू के हरिजनों के साथ अमानवीय व्यवहारः सरकार को डिप्रेस्ड क्लासेज लीग द्वारा ज्ञापन।

पटियाला, अगस्त 1950, पेप्सू प्राविंशियल डिप्रेस्ड क्लासेज लीग ने राज्य सरकार को एक ज्ञापन दिया है, जिसमें कहा गया है कि इस राज्य में पिछड़ी जाति के लोगों की बिना बात मार-पीट, उनकी स्त्रियों के साथ अभद्र आचरण, हरिजनों की उनकी जमीनों से जबरदस्ती बेदंखली, हरिजनों और उनके मवेशियों को उनके कच्चे घरों में घेरकर बिना किसी कसूर के कई-कई दिनों तक बंद रखना आदि उन लोगों की लंबी दर्दभरी दास्तान हैं, जिनकी आहों की लपटें उसी अनुपात में ऊंची उठ रही हैं, जिस अनुपात में यह कहा जाता है कि इस राज्य में अपराधों की लपटें बुझती जा रही हैं।

पेप्सू में पुलिस की जोरदार कार्रवाई से अपराधों की संख्या तो घट रही है, लेकिन पिछड़ी जाति के लोगों को गैर-सामाजिक तत्वों के विरुद्ध संरक्षण न दिया जाना कम दुख की बात नहीं है। पिछड़ी जातियों के लोग अपनी आर्थिक तंगी के कारण संबंधित अधिकारियों तक अपनी रोजाना की कठिनाइयों का दुखड़ा नहीं पहुंचा सकते कि वे उनकी रक्षा के लिए तुरंत प्रबंध कर सकें और उन्हें जबरन अपने भाग्य पर भरोसा कर चुप हो बैठ जाना पड़ता है। इससे अत्याचार करने वालों को जहां प्रोत्साहन मिलता है, वहीं यहां के लोगों में मौजूदा हालत को लेकर निरंतर असंतोष बढ़ रहा है, जिसका फायदा स्वार्थी लोग उठा रहे हैं।

पेप्सू में हरिजनों के साथ कितना अधिक अमानवीय व्यवहार हो रहा है, इस बारे में ‘प्राविंशियल डिप्रेस्ड क्लासेज लीग’ ने एक और घटना का उल्लेख किया है। ऊंची जाति के एक जमींदार के कुएं से पीने के लिए पानी लेने पर बरनाला जिले के कातुं गांव के चांद सिंह नामक हरिजन को उसका मुहं काला कर उसे गधे पर बिठाकर गांव-भर में घुमाया गया। स्वतंत्र भारत की बदली हुई परिस्थितियों में पेप्सू में अनुसूचित जाति के लोगों को यहां की ऊंची जाति के लोगों द्वारा किए जा रहे अनोखे दमन के कारण दिन-प्रतिदिन कठिनाइयों का असहाय हो सामना करना पड़ रहा है।’’