1334 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-2)
विवाहसंबंधी धाराएं
पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
प्रथम लेख में मैंने पाठकों से निवेदन किया था कि ‘हिन्दू कोड बिल का उद्देश्य हिन्दू धर्म, समाज और संस्कृति का सर्वनाश करना है’ इत्यादि कल्पित, असत्य नारों पर विश्वास न करके उन्हें निष्पक्षता होकर गम्भीर भाव से हिन्दू कोड बिल की भिन्न 2 धाराओं पर विचार करना चाहिये। इस लेख में मैं विवाह विषयक धाराओं पर कुुछ प्रकाश डालना चाहता हूं।
विवाह को शास्त्रीय और सिविल इन दोनों भागों में विभक्त करते हुए शास्त्रीय विवाह की शर्तें धारा 7 में निम्नलिखित मानी गई हैं:
धारा 7-यदि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो जाती हैं तो किन्हीं भी दो हिन्दुओं में शास्त्रीय रीति के अनुसार विवाह सम्पन्न हो सकेगा:
(1) यदि दोनों पक्षों में विवाह के समय पर कोई पक्ष भी पति अथवा पत्नी नहीं रखता।
(2) यदि दोनों पक्षों में विवाह के समय कोई जड़ बुद्धि या पागल नहीं है।
(3) यदि विवाह के समय वर अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुका है और वधू
14 वर्ष आयु पूरी कर चुकी है।
(4) यदि दोनों पक्ष परस्पर निष्ोधात्मक सम्भन्ध की कोटियों के अन्तर्गत नहीं आते।
(5) यदि दोनों पक्ष आपस में परस्पर सपिण्ड नहीं हैं और यदि पारस्परिक आचार और परम्परा के अन्तर्गत दोनों पक्षों में ऐसा संस्कार जायज (वैध) मानने की प्रथा न हो।
(6) जहां वर या वधू 16 वर्ष की आयु पूरी नहीं कर चुकी हैं उसके संरक्षक को स्वीकृति प्राप्त की जा चुकी है।
सपिण्ड सम्बन्ध की परिभाषा और व्याख्या करते हुए धारा 5 में कहा गया है कि,µ
(1)(क) सपिण्ड सम्बन्ध का अर्थ अपने मातृकुल की तीन पीढ़ी तक और पितृकुल की 5 पीढ़ी तक होगा।
(ख) दो व्यक्ति उसी अवस्था में परस्पर सपिण्ड कहे जाते हैं यदि वे, एक दूसरे के वंश-परम्परा से सपिण्ड सम्बन्ध की सीमा के भीतर समर्वशज हैं अथवा यदि वे दोनों सपिण्ड सम्बन्ध की सीमा के भीतर सम्मिलित वंश परम्परागत आपस में एक दूसरे के साथ समान वंशज के रूप में हैं।
(ग) निषिद्ध सम्बन्ध का क्रम --- दो व्यक्तियों का उस अवस्था में निषिद्ध सम्बन्ध कहा जाता है यदि दोनों में से एक वंशानुक्रम से दूसरे का पुरखा हो, अथवा वंशानुक्रम से पुरखे या संतति की पत्नी या पति रहा हो, अथवा वे दोनों भाई-बहन, चाचा-भतीजी और चाची-भतिजा अथवा भाईयों व बहनों की सन्तति हों।