Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 558

ANNEXURE II 1335

स्पष्टीकरण:- वाक्य खण्ड 1 और 2 में ये समबन्ध भी शामिल हैं। (अ) ऐसा सम्बन्ध जो कि अर्धरक्तयुक्त सहोदर रक्तयुक्त है।
(2) धर्मज तथा अधर्मज सन्तति सम्बन्ध।
(3) दत्तक अथवा रक्त सम्बन्ध।
उक्त वाक्य-खण्डों में कथित सभी सम्बन्धद्योतक शब्दों का इसी प्रकार अर्थ समझा जायेगा। पाठक देखेंगे कि शास्त्रीय विवाह के लिए जो शर्तें उपर वर्णित की गई हैं वे अधिकतर वही हैं जिन्हें धार्मिक दृष्टि से अब भी प्राय: मान्य समझा जाता है। अन्तर थोड़ा सा हैं। "पंचमात् सप्तमादूर्ध्वंमातृत: पितृतस्तथा"। इत्यादि स्मृति वचनों में मातृकुल और पितृकुल की क्रमश: 5 और 7 पीिढ़यों को सपिण्ड मानकर उन्हें छोड़ने का विधान है यद्यपि स्मृति चन्दि्रका, चतुर्विशति मत संग्रहादि में 3 और 5 तक ही सपिंडता मानी गई हैं कई पौराणिक ग्रन्थों में तो सपिंडता का और भी अधिक संकोच करते हुए मामा की लड़की इत्यादि से भी विवाह को उचित माना गया है और दाक्षिणात्यों में कई स्थानों पर वैसी ही प्रथा है। इसलिए कोड बिल में मध्यमार्ग को ग्रहण किया गया है। यदि 3 और
5 पीिढ़यों के स्थान पर मातृकुल और पितृकुल की क्रमश: 5 और 7 पीिढ़यों को छोड़ा जाय तो अधिक शास्त्रीय होगा इसमें सन्देह नहीं। किंतु यह कहना कि इस कोड बिल के अनुसार भाई बहिन का विवाह भी वैध समझा जायेगा, जैसे कि कोड विरोधी लोगों ने कुछ पत्रें और पोस्टर आदि में प्रकाशित किया था सर्वथा असत्य है, यह तो स्पष्ट ही है। मेरे विचारानुसार शास्त्रीय विवाह के नियमों में यदि दोनों पक्ष परस्पर सपिण्ड नहीं हैं। इसके बाद धारा 7 उपधारा 5 में यह जो अपवाद रखा गया है कि यदि पारस्परिक आचार-परम्परा के अन्तर्गत दोनों पक्षों में ऐसा संस्कार वैध या जायज मानने की प्रथा न हो ये शब्द भी उड़ा देने चाहिए जिससे एकरूपता की रक्षा के अतिरिक्त सपिण्डों अथवा निकट सम्बन्धियों में विवाह के निष्ोध विषयक शास्त्रेक्त वैज्ञानिक आज्ञा का पालन हो सके।
अनेक हिंदू कोड बिल विरोधी कितने असत्य और छल का आश्रय ले रहे हैं इसका एक और अति स्पष्ट उदाहरण दिए बिना मैं नहीं रह सकता। ऊपर शास्त्रीय विवाह की शर्तों के विषय में मैंने जिस धारा संख्या 7 को उद्धत किया है उसमें चौथी शर्त मूल अंग्रेजी में इन शब्दों मेें है (4) The parties are not within the degrees of prohibited relationship हिन्दू कोड विरोधी समिति कलकत्ता ने हिन्दू कोड बिल का जो कुछ अनुवाद हिंदी में छपाया उसमें पृ- 5 पर इसका अनुवाद इस प्रकार दिया:
दोनों ही पक्ष (वर-वधू) निषिद्ध सम्बन्ध के क्रम मे आते हों। मूल का अर्थ ‘निषिद्ध सम्बन्ध के क्रम में न आते हों’ यह है। किन्तु अनुवादक महाशय जनता में उसके विरुद्ध भावना भरने के लिए उसके "न" को खाकर अनुवाद कर बैठे हैं कि शास्त्रीय विवाह वह होगा जहां दोनों पक्ष निषिद्ध सम्बन्ध के क्रम में आते हैं। यह मानना बड़ा कठिन है कि यह छापे की भूल है। मुझे तो इसमें स्पष्ट ही शरारत प्रतीत होती है। इस अनुवाद के अन्तिम पृष्ठ पर लिखा है ‘प्रत्येक हिंदू चेत जाए। हिंदू कोड बिल हिंदू समाज और