1336 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
संस्कृति का तख्ता ही उलट देने का भयानक कुचक्र है।’ मैं इस बात का निर्णय पाठकों पर छोड़ना चाहता हूं कि क्या ऐसे असत्य से हिंदू समाज और संस्कृति की रक्षा हो सकती है?
बहुविवाह का पति-पत्नी दोनों के लिए निष्ोध करके वस्तुत: "जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम्" "इहेमाविन्द्र संनुद चक्रवाकेव दम्पती" इत्यादि वेद मंत्रें में स्पष्टतया निर्दिष्ट एक विवाह के आदर्श की ही समर्थन किया गया है। " संमतपन्त्यभित: सपत्नीरिव पर्शव: " इत्यादि वेद-मंत्रें में सपत्नीत्व को अत्यन्त दु:खदायक बताया गया है। दुर्भाग्यवश कुुछ शिक्षित युवक-युवतियों में भी यह बहुविवाह की प्रवृत्ति बढ़ रही थी और उसके भयंकर परिणाम दृष्टिगोचर हो रहे थे अत: इस प्रकार का प्रतिबन्ध आवश्यक ही था। वर्तमान हिंदू कानून के अनुसार पुरुष जितने चाहे विवाह कर सकता था जिसके कई उदाहरण देहली के सम्पन्न तथा प्रतिष्ठित समझे जाने वाले व्यक्तियों में भी विद्यमान है। एक पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह करना प्रथम पत्नी को विष देने के समान है यह लिखने की आवश्यकता नहीं।
न्यूनतम आयु के विषय में यहां वर-वधू के लिए 18 और 14 को नियत किया गया है जिसे हम सर्वथा अपर्याप्त समझते हैं। हमारे विचार में तो 24 और 16 से कम विवाहार्थी वर-वधू की आयु न होनी चाहिए। ‘अष्टवर्षा भवेद् गोरी’ जैसे वेद विरुद्ध श्लोकों को मानने वाले इस अंश का भी विरोध करें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
विवाह विषयक इन धाराओं में जातिमूलक भेदभाव को जो स्वीकार नहीं किया गया इस से कई कट्टरपन्थी भले ही अप्रसन्न हों किन्तु जो विचारशील लोग हैं जानते हैं कि इस कृत्रिम, जन्ममूलक जातिभेद ने किस प्रकार हिन्दू समाज को 8 हजार के लगभग जातियों-उपजातियों में विभक्त कर के उस की एकता, संगठन और परस्पर प्रेम को नष्ट कर रक्खा है तथा किस प्रकार यह जाति-भेद ‘अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते संभ्रातरो वावृधु:सौभगाय।’ (ट्ट- 5/56/5) ‘शूद्रो ब्राहा्रणतामेति, ब्राहा्रणश्चैति शूद्रताम् (मनु 10/46), न जात्या ब्राहा्रणश्चात्र, क्षत्रियो वैश्य एव न । न शूद्रो न च वै म्लेंच्छो भेदिता गुणकर्मभि:।।’ शुक्रनीति, ‘न कुलेन न जात्या वा, क्रियाभिर्ब्राहा्रणो भवेत्।’ (महाभारत वनपर्व) इत्यादि शास्त्रीय वचनों के सर्वथा विरुद्ध है जहां वर्णव्यवस्था को केवल गुण कर्मानुसार बताया गया है तथा जन्म की दृष्टि से सब मनुष्यों की समानता का प्रतिपादन है उन्हें इससे जरा भी दु:ख न होगा । वर्ण-व्यवस्था को गुणकर्मानुसार मान लेने पर (जिस सिद्धांत की सनातनता की घोषणा गत वर्ष काशी आदि स्थानों की, विद्वन्मंडली भी कर चुकी है) विवाह में जाति का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। वस्तुत: अन्तरजातीय विवाहों के समर्थन में अनेक शास्त्रीय वचनों और ऐतिहासिक उदाहरणों को प्रस्तुत किया जा सकता है किंतु विस्तारभय से मैं यहां ऐसा करना अनावश्यक समझता हूं। जो भाई जन्म-मूलक जातिभेद को मानते हैं, इस कोड में उन के लिए कोई प्रतिष्ोध नहीं है। उनकी अपने विश्वासानुसार विवाहादि करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है।