Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 561

1338 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-3)

विवाह-विच्छेद की परिस्थितियां

पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
इस तृतीय लेख में मैं विवाह संबन्ध विच्छेदादि विषयक धाराओं पर कुछ विचार करना चाहता हूँ जो मुख्यतया निम्न हैंµ
धारा 30--कोई ऐसा विवाह, चाहे वह इस कोड में आरम्भ होने से पहले अथवा बाद में सम्पूर्ण हो चुका है, निम्नांकित आधारों में से किसी एक के कारण खत्म हो जायेगा।
(1) यदि ऐसे विवाह के समय पर और तब से लेकर लगातार इस सम्बन्धी अदालती कार्यवाही के आरम्भ तक विवाह के दोनों पक्षों में से कोई एक नपुंसक था।
(2) यदि पति किसी स्त्री को रखेली के रूप में रख रहा है अथवा पत्नी किसी पर पुरुष की रखेली बन कर रह रही है या वेश्या का जीवन व्यतीत कर रही है।
(3) यदि विवाह के दोनों पक्षों में से कोई पक्ष दूसरा धर्म ग्रहण कर लेता है और हिन्दू धर्म को त्याग देता है।
(4) यदि विवाह के दोनों पक्षों में एक पक्ष असाध्यरूप में उन्मत्त या पागल है और ऐसे प्रार्थनापत्र के देने के पहले निरन्तर पांच वर्ष के लिए उसका इलाज किया जा चुका है।
(5) यदि दोनों पक्षों में कोई एक बडे़ भयानक और असाध्य प्रकार के कुष्ठ से पीड़ा उठा रहा है।
पूर्व इसके कि मैं इस अत्यन्त विवादास्पद और गंभीर विषय पर वैयक्तिक रूप से अपने विचार जनता के सामने रखूं, मैं यह स्पष्ट कर देना आवश्यक समझता हूं कि वैदिक आदर्श के अनुसार पति पत्नी सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होना चाहिए। पाणिग्रहण से समय जो मन्त्र ‘गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथास: । भगो अर्यमा सविता पुरन्धिमहा्र त्वादुर्गार्हपत्याय देवा:। (ऋ- 10, 85, 36) ‘मभेयमस्तु पोष्या मह्य त्वादाद् वहस्पति: । मया पत्या प्रजावती संजीव शरद: शतम् ।। (अथर्व 14, 1, 52)
इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं उनमें वर वधू को संबोधित करते हुये स्पष्ट कहता है कि मैं तुम्हारे हाथ को सौभाग्य की वृद्धि के लिए ग्रहण कर रहा हूँ, तुम मेरे साथ वृद्धावस्था पर्यन्त सुखपूर्वक निवास करो। तुम मेरी पोष्या या भार्या हो। परमात्मा ने तुम्हें मुझे दिया है। मुझ पति के साथ तुम 100 वर्ष पर्यन्त सुख शान्ति पूर्वक रहो।
(1) ‘‘आ न: प्रजां जनयतु प्रजा पतिराजसाय समनक्त्वर्यमां। अदुर्भमंली: पतिलोकमाविश शं नो भव द्विपदे श्ां चतुष्पदे।।" (ऋ- 10/85/43)
(2) "इहैवस्तं मावियौष्ट विश्वमायुर्व्यश्नुतम्।
क्रीड़न्तो पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे।।" (ऋ- 10/85/42)
इत्यादि विवाह सूक्त के अन्य मन्त्रें में भी यह स्पष्टतया कहा गया है कि परमात्मा हमें वृद्धावस्था पर्यन्त सदा मिलाये रक्खे। हे पति-पत्नि! तुम दोनों यहां रहो। (मावियौष्टम्)