ANNEXURE II 1339
तुम्हारा एक दूसरे से कभी वियोग व विरोध न हो अथवा तुम एक दूसरे का परित्याग न करो। घर में प्रसन्न होकर सम्पूर्ण आयु को आनन्दपूर्वक बिताओ, इत्यादि।
वैदिक आदर्श के अनुसार निम्न नियम आवश्यक हैं —
(1) कम से कम 24 वर्ष तक पुरुष और 16 वर्ष तक कन्या पूर्ण ब्रहा्रचर्य का पालन करें तभी एक दूसरे की प्रसन्नता से गृहस्थाश्रम में प्रवेश करें।
(2) विवाह युवावस्था में स्वयंवर रूप में होना चाहिये, जब परस्पर दृढ़ कामना हो तभी विवाह होना चाहिए अन्यथा नहीं। यह भाव ‘ एयमगन् पति कामा जनिकामो{हमागमम् ।’ (अथर्व वेद) ‘वधूरियं पति मिच्छन्त्येति।। (ऋ- 5/37/3) ‘भद्रा वधूर्भवति यत्सुपेशा स्वयं सा मित्र वनुते जने चित् ।। (ऋ- 10/27/12)
इत्यादि वेद मन्त्रें में स्पष्टतया प्रतिपादित है। दोनों अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को जानते हुए परस्पर प्रसन्नतापूर्वक विवाह करते हैं।
(3) पुरुष को पत्नीव्रत धर्म का और स्त्री को पतिव्रत धर्म का भली भांति सदा पालन करना चाहिए। परस्पर पूर्ण विश्वास रखते हुए उन्हें धर्म, अर्थ, काम में पूर्ण सहयोग देना चाहिये।
यह लिखने की आवश्यकता नहीं कि इन वैदिक आदर्शों का पालन करते हुए विवाह सम्बन्ध विच्छेदादि का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। किन्तु दुर्भाग्यवश इन आदर्शों और नियमों से जनता बहुत दूर जा चुकी है। न ब्रह्यचर्य का क्रम रहा, न वेदाध्ययनादि का और न अन्य वैदिक नियमों का पालन किया जाता है जिस से शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का विकास हो सके। ऐसी दशा में प्रश्न उपस्थित होता है कि जो अवस्थाए धारा 30 में वर्णित हैं उन में क्या किया जाए।
मध्यकाल में जो भी स्मृतियां लिखी गइंर् तथा अन्य ग्रन्थ बनाऐ गऐ उन में वैदिक आदेशों के विरुद्ध बहुत सी बातें पाई जाती हैं जिन को प्रामाणिक मान कर बाल्य विवाह प्रचलित हो गया, स्ति्रयों से वेदाध्ययन और यज्ञ का अधिकार छीन लिया गया, विवाह केवल माता पिता या अधिकतर अशिक्षित पुरोहित या नाई आदि की इच्छा से होने लगे जिनमें गुणकर्म स्वभाव के मेल का विचार न करके केवल जाति उपजाति की समानता का ध्यान रक्खा गया। ऐसी अवस्था में जो शोचनीय परिस्थिति उत्पन्न हो गई उसको सुधारने की आवश्यकता से कोई विचारशील व्यक्ति इन्कार नहीं कर सकता। बाल्य विवाह का ही कुपरिणाम बाल्य मरण, निर्वीर्यता व नपुंसकता आदि के रूप में दृष्टिगोचर होता है। पति-पत्नी के कलह तथा पतियों द्वारा विवाहित पत्नियों के त्याग, उन से क्रूरतापूर्ण व्यवहार अथवा पुनर्विवाह आदि के सैकड़ों नहीं हजारों उदाहरण किसी भी नगर में सुगमता से पाये जा सकते हैं। ऐसी अवस्था में क्या वैदिक आदर्शों अथवा सनातन धर्म की दुहाई देने से काम नहीं चल सकता है? इस प्रश्न पर समाज-हितैषियों को गम्भीरता से विचार करना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस प्रतिकार का अवलम्बन किया जाए वह कहीं वर्तमान अवस्था को और भी बिगाड़ने वाला न हो।
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