Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 563

1340 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-4)

विवाह-विच्छेद और स्मृति आदि ग्रंथ

पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
प्राय: कहा जाता है कि विवाह सम्बन्ध विच्छेद (जिसे साधारणतया तलाक के नाम से कहते हैं) हिन्दू धर्म तथा हिन्दू समाज की भावना के सर्वथा विरुद्ध तथा उसके लिए सर्वथा नवीन प्रथा है जिसको इस बिल द्वारा हिन्दू समाज पर लादा जा रहा है। यही बात भारतीय राष्ट्र भारतीय राष्ट्र संसद (पार्लियामेंट) में पं- लक्ष्मीकान्त मैत्रदि अनेक सज्जनों ने बार बार कही थी किन्तु स्मृतिग्रन्थों तथा मध्यकालीन अन्य साहित्य का निष्पक्षपात अनुशीलन करने पर इसकी असत्यता स्पष्ट ज्ञात है। जैसे कि इस लेख के प्रारभ्मिक भाग में मैं दिखा चुका हूँ वैदिक आदर्शों का अनुकरण करते और विवाह विषयक वैदिक नियमों का पालन करते हुए तो विवाह सम्बन्ध विच्छेद का प्रश्न ही नहीं उठ सकता किन्तु उन आदर्शों से दूर होने और वेद विरुद्ध प्रथाओं के अनुसरण के कारण जो शोचनीय अवस्था उत्पन्न हो चुकी है हमें तो इस समय उसपर विचार करना है। निम्नलिखित स्मृत्यादि वचनों को इस सम्बन्ध में ध्यान में रखना चाहिए। सब से पूर्व मैं उस स्मृति वचन को उद्धृत करता हूं जो सुप्रसिद्ध है :
(1) ‘‘नष्टे मृते प्रव्रजिते, क्लीबे च पतिते पतौ । पंचस्वापत्सु नारीणां, पतिरन्यो विधीयते।।’’
यह श्लोक पराशरस्मृति केे अ- 4 का श्लोक 30 है। पराशरस्मृति के ‘कलौ पाराशर: स्मृत:’ अथवा ‘कलौ पराशरी स्मृति: ।। ’ इत्यादि के अनुसार इस कलियुग में हमारे पौराणिक भाई जो हिन्दू कोड बिल का विरोध कर रहे हैं सब से अधिक प्रामाणिक मानते हैं। इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है कि —
पति के नष्ट हो जाने (उनके गुम हो जाने अथवा उसके विषय में कोई समाचार ज्ञात न होने), मर जाने, संन्यासी हो जाने, नपुंसक होने अथवा पतित हो जाने पर — इन पांच आपत्तियों में स्ति्रयों के लिए दूसरे पति का विधान किया जाता है।
हिन्दू धर्म का परित्याग करके मुसलमान व ईसाई हो जाना श्रद्धालु हिन्दुओं की दृष्टि में पतित हो जाना है! अत: धारा 30 में वर्णित अनेक बातों का इसे आधार कहा जा सकता है इसमें कोई सन्देह नहीं।
मुझे मालूम है कि पौराणिक भाष्यकार तथा भाई इस श्लोक के ‘पतौ’ का अर्थ विवाहित पति नहीं किन्तु उत्पत्स्यमानपति’ या भावी पति करके इस श्लोक का सम्बन्ध विवाह संस्कार से पूर्व केवल वाग्दान की अवस्था मेें मानते हैं और व्याकरण की दृष्टि से तोड़ मरोड़ कर ऐसा अर्थ करने का दु:साहस करते हैं। किन्तु ‘पति: अन्यो विधीयते’ इन शब्दों से जिनका अर्थ सिवाय इसके कोई हो ही नहीं सकता कि दूसरे पति का विधान किया जाता है उनके इस प्रयत्न की निस्सारता सिद्ध होती है। यहां ‘पतौ’ इसको आर्षप्रयोग मानना ही उचित है। इस पर भी यदि किसी को सन्देह हो तो नारदीय मनुसंहिता अध्याय 12 के श्लोक 99 को देखना चाहिए जो निम्न शब्दों में है :