Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 564

ANNEXURE II 1341

‘‘पत्यौ प्रव्रजिते नष्टे, क्लीबे{थ पतिते मृते। पंचस्वापत्सु नारीणां, पतिरन्यो विधीयते।।’’
(देखो नारदीय मनुसंहिता भवस्वामिभाष्यसंहिता साम्बशिवशास्ति्रणा सम्पादिता त्रिवेन्द्रम् सन्
1929 पृ- 144) यहां उसी ऊपर उद्ध्त श्लोक को ही थोड़े से शब्दभेद से दिया गया है। मुख्य बात यह कि ‘पत्यौ’ शब्द का प्रयोग है जो लौकिक व्याकरण की दृष्टि से भी सर्वथा ठीक है। इसका अर्थ वही है जो ऊपर दिया जा चुका है। वृद्ध मनुस्मृति अ
9 पृ- 111 में भी यह श्लोक पाया जाता है। अग्निपुराण अ- 154 में भी यही श्लोक पराशर स्मृति के पाठ के अनुसार विद्यमान है।
गौतम धर्म के सूत्र के मस्करिभाष्य में अपतिरपत्यलिप्सुदेवरात् 18/4 की व्याख्या में लिखा है।
अपति: – अविद्यमान भर्तृका अयोग्यपतिर्वा तथा च बृहस्पति: ‘नष्टे मृते प्रव्रजिते, क्लीबे च पतितेपतौ। पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते’ इति।
(देखो पं- लक्ष्मण शास्त्री जोशी तर्कतीर्थ पूना द्वारा सम्पादित "धर्मकोष" व्यवहार कांड पृ- 1012) इससे ज्ञात होता है कि बृहस्पति स्मृति में भी यह श्लोक पाया जाता था जो स्मृति इस समय सम्पूर्णतया उपलब्ध नहीं होती।
इनके अतिरिक्त चौखम्बा संस्कृत ग्रन्थमाला कार्यालय बनारस से मनुस्मृति कुल्लूक भाष्य सहित संवत् 1992 में प्रकाशित हुई थी उसके अन्त में वर्तमान मनुस्मृति में अविद्यमान किन्तु अन्य ग्रन्थों में मनु के नाम से वर्णित श्लोकों को ‘स्मृति चन्दि्रका’ नामक सुप्रसिद्ध निबन्ध ग्रन्थ के आधार पर उद्धृत किया गया है जिससे प्रतीत होता है कि पहले मनुस्मृति में भी यह श्लोक पाया जाता था। जो श्लोक इतनी स्मृति-पुराणादि में पाया जाता हो उसको ऐसे ही टाला नहीं जा सकता।
(2) मनुस्मृति अ- 9 श्लोक 72 भी इस सम्बन्ध में विचारणीय है जो निम्न लिखित है :
"विधिवत् प्रतिगृह्यापि, त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम्, व्याधिताम् विप्रदुष्टां वा, छप्रना चोपपादिताम्।" इसका अनुवाद साधुचरणप्रसाद जी ने वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई में मुद्रित ध र्मशास्त्र संग्रह के पृष्ट 193 में इस प्रकार दिया हैµ
"वर को उचित है कि अलक्षण दोष वाली रोगिणी, मैथुन संसर्ग वाली अथवा ठगहारी करके दी हुई कन्या को विधिपूर्वक ग्रहण करके भी त्याग देवे ।"
(3) नारदीय मनुसंहिता 12/32 में लिखा है :
" यस्तु दोषवती कन्याम्, अनाख्याय प्रयच्छति। दोष्ो तु सति नाग: स्यात्, अन्योन्यं त्यजतोस्तयों : ।।" साधुचरणप्रसाद जी ने धर्मशास्त्र संग्रह पृ- 194 में इसका अनुवाद यों दिया है:µ
"यदि कन्या के दोष को छिपाकर वर को कन्या दी जाए तो वर कन्या को त्याग देवे और वर के दोष को छिपाकर कन्या से विवाह किया जाए तो कन्या वर को त्याग देवे इस में कोई अपराधी न होगा।" (धर्मशास्त्रसंग्रह पृष्ठ 194)।