Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 566

ANNEXURE II 1343

हुए मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था को ऐसा सुधारना चाहिये कि सम्बन्ध विच्छेदादि का विचार भी कभी विवाहित पति-पत्नी के मन में उत्पन्न न हों पत्नीव्रत और पातिव्रत धर्म का पालन जो हमारी प्राचीन संस्कृति के मुख्य तत्त्व हैंµयदि पति-पत्नी करें तो इस प्रकार के विधान सर्वथा अनावश्यक हो जाएं। सब समाज-हितषियों को मिल कर ऐसा ही प्रयत्न करना चाहिये। अत्यन्त विशेष आपत्ति, आकस्मिक मरण, असमर्थतादि में प्राचीन नियोग पद्धति का आश्रय लिया जा सकता है, किन्तु वर्तमान परिस्थिति में यदि इसे व्यावहार्य न माना जाय तो अत्यन्त विकट और जटिल अवस्थाओं में जहां अन्य कोई चारा ही न हो, सम्बन्ध विच्छेद की अनुमति अन्तिम साधन के रूप में दी जा सकती है पर उसकी शर्तों को अत्यधिक कठोर बनाना चाहिए ताकि उसका दुरुपयोग न हो सके। पाश्चात्य देशों में तलाक को जो अत्यन्त सुलभ बना दिया गया है उसके कारण नैतिकता व सदाचार का अत्यन्त हृास हो रहा है जो अवस्था अत्यन्त निन्दनीय है अत: हमें उसका अनुकरण न करना चाहिए। अत: जो ध ारा 30 मैंने इस लेख के प्रारम्भ में उद्धृत की थी उसमें निम्न संशोधन मुझे अत्यावश्यक प्रतीत होते हैं:
(1) ऐसा नियम बना दिया जाय कि विवाह के 8 वर्ष बाद तक कोई सम्बन्ध विच्छेद के लिए प्रार्थनापत्र नहीं दे सकता और न किसी को ऐसी अनुमति उस अवधि तक दी जायेगी। विश्वस्त-सूत्र से ज्ञात हुआ है कि 5 वर्ष की अवधि को इस बिल के प्रस्तोता संशोधन के रूप में स्वयं स्वीकार करने को उद्यत हैं यदि उसे 8 वर्ष तक बढ़ा दिया जाय तो अधिक अच्छा हो। इस बीच में बहुत अधिक सम्भावना यही है कि पति-पत्नी एक दूसरे के स्वभावादि से परिचित होकर सम्बन्ध-विच्देदादि का विचार भी न करेंगे।
(2) नपुंसकता, पागलपन, कुष्ठ इत्यादि की चिकित्सा के लिए भी 8 वर्ष की अवधि देना उचित है। यदि भली-भांति चिकित्सा और सेवा-शुश्रूषा करने पर भी लाभ न हो और पति-पत्नी सम्बन्ध-विच्छेद पर ही उतारू हों तो इस 8 वर्ष की अवधि के पश्चात् उसकी अनुमति दी जा सकती है।
विवाह-विच्छेद विषयक धारा 30 के अतिरिक्त धारा 33 में ‘अदालत अलहदगी’ के विषय में कहा गया है कि:
"विवाह के दोनों पक्षों में से कोई भी व्यक्ति चाहे ऐसा विवाह इस कोड के आरम्भ काल से पहले अथवा पीछे सम्पूर्ण हो चुका है जिला अदालत को इस आधार पर अदालती अलहदगी की डिग्री प्राप्ति के लिये प्रार्थना कर सकता है कि दूसरा पक्षµ
(अ) प्रार्थी को एक ऐसे समय से छोड़ चुका है कि जिसकी अवधि 2 वर्ष से कम नहीं है।
(इ) ऐसे जुल्म या अत्याचार का दोषी हो चुका है कि जिस के फलस्वरूप प्रार्थी उक्त पक्ष के साथ रहने में भयभीत हो चुका है अथवा
(उ) असाध्य, सोजाक, आत्यंतिक व्याधि से पीिड़त हो रहा है जो कि प्रकट अवस्था में है तथा जो कि उसे प्रार्थी की ओर से नहीं लगी है तथा इतने समय से वह इस व्याधि से पीिड़त है जिसकी अवधि उस प्रार्थना-पत्र देने के सन्निहित काल से आरम्भ करके एक वर्ष से कम नहीं है।
(ऋ) एक भयानक प्रकार से कुष्ठ (कोढ़) से पीिड़त हो रहा है अथवा
(ए) विवाह की तारीख से लेकर उसे लगातार स्वाभाविक पागलपन हो चुका है अथवा