Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 567

1344 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES

(ओ) दाम्पत्य काल के दौरान में व्यभिचार कर चुका है।"
इन नियमों में भी 1 और 2 वर्ष की अवधि के स्थान पर कम से कम 5 वर्ष की अवधि रखनी चाहिए। यह अदालती अलहदगी, संपूर्ण तथा विवाह विच्छेद से भिन्न है अत: न्यायाधीशों तथा अन्यों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिससे दम्पती प्रेमपूर्वक साथ रहने को पुन: उद्यत हो जाएं।
पातिव्रत धर्म के महत्त्व के विषय में जो कहा जाता है वह ठीक ही है और इसमें सन्देह नहीं कि वह हमारी संस्कृति और सभ्यता के लिए विशेष गौरव की वस्तु है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए थोड़ी है। दु:ख की बात यही है पत्नीव्रत धर्म के महत्त्व पर हिन्दू समाज में उतना बल नहीं दिया जाता अन्यथा इतनी शोचनीय दशा न होती, और न इस प्रकार के नियमों की कोई आवश्यकता होती । बड़ौदा में सन 1931 से हिन्दू डाइबोर्स लॉ अथवा सम्बन्ध विच्छेद की अनुमति का कानून विद्यमान है, किन्तु तब से अब तक उन जातियों की ओर से जहां पहले तलाक की प्रथा न थी केवल 43 की केस हुए हैं जिन में मुख्य आधार पति की ओर से क्रूरता और परित्याग ही था।
अत: इन उपर्युक्त धाराओं की भी न जानते हुए अज्ञ जनता में उत्तेजना उत्पन्न करने के लिए जो यह फैलाया जा रहा है कि इस बिल के अनुसार जब इच्छा होगी पति-पत्नी एक दूसरे का परित्याग कर देंगे और इस प्रकार हिन्दू जाति और उसकी संस्कृति का नाश हो जायेगा, यह बात सर्वथा असत्य है।
धारा 34 में स्पष्ट कहा गया है कि "कोई भी विवाह तब तक कानूनी तौर पर परित्यक्त हुआ नहीं विचारा जायेगा जब तक कि उस पर किसी समुचित आदालत द्वारा यह घोषित करते हुए डिग्री नहीं दी जाती कि ऐसा विवाह या तो विवाह-विच्छेद के लिये दिये प्रार्थना-पत्र पर खतम किया गया है अथवा किसी अन्य ऐसी कानूनी कार्यवाही में समाप्त किया गया है जिसमें विवाह का जायजपन (वैधता) विचारणीय विषय था।"
धारा 44µविवाह समाप्ति सम्बन्धी प्रत्येक डिग्री जो जिला जज द्वारा दी गई है वह हाईकोर्ट द्वारा पक्का होने का विषय होगी। इत्यादि इन नियमों का दुरुपयोग किसी भी अवस्था में न होने पाए और इन्हें नर्म न बना दिया जाय (जैसे कि पाश्चात्य देशों में है) यह चेतावनी देना आवश्यक है। "भारत में लगभग 90 प्रतिशत जातिभेद की दृष्टि से शूद्रों में आते हैं। जिनमें सम्बन्ध-विच्छेद की प्रथा किसी न किसी रूप में प्रचलित है", यह माननीय डा- अम्बेडकर का कथन कहां तक ठीक है यह मुझे ज्ञात नहीं। सम्भवत: इसमें कुछ अत्युक्ति हो। जातिभेद की अनिश्चितता के कारण भी ऐसा संभव है तथापि इसे मैं तलाक की प्रथा को उत्तम समझने अथवा उसे अपनाने की युक्ति के रूप में मानने को उद्यत नहीं। हां सर्वथा अन्तिम साधन के रूप में उपायान्तर न होने पर ही उसकी अनुमति अति विशेष अवस्थाओं में दी जा सकती है। मैंने ये बातें समस्त हितैषियों के विचारार्थ लिखी हैं। आशा है समाजहित और शास्त्रीय वचनों को ध्यान में रखते हुए इन पर विद्वान् लोग निष्पक्ष होकर विचार करेंगे। यदि वर्तमान शोचनीय परिस्थिति का अन्य कोई प्रतिकार हो सकता है तो उसका भी निर्देश करेंगे।

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