1346 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
है कि वह हिन्दू हो। इन शर्तों को न जानते हुए अथवा जान बूझकर भी कोड बिल विरोधियों की और से पत्रें में यह जो आन्दोलन किया गया, कि इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को चाहे वह मुसलमान व ईसाई भी क्यों न हो अब गोद लिया जा सकेगा, उसकी असत्यता स्पष्टतया ज्ञात होती है जाति विषयक प्रतिबन्ध की वस्तुत: इस विषय में कोई आवश्यकता व उपयोगिता नहीं, अत: आशा है उदार मनोवृत्ति वाले सभी समाजहितैषी इस धारा का वर्तमान रूप में स्वागत करेंगे। संकीर्ण मनोवृत्ति वाले कूपमंडूकों का तो इससे अप्रसन्न होना स्वाभाविक है किन्तु इस संकीर्णता से समाज और राष्ट्र की उन्नति असम्भव है। हां, जो अपनी कल्पित जाति-उपजाति तक दत्तक लेने के अधिकार को सीमित रखना चाहें उनको ये नियम ऐसा करने से रोकते नहीं, उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता है।
दत्तक विधान में एक मुख्य परिवर्तन जो प्रवर समिति ने किया है वह इस प्रकरण में उल्लेखनीय है। वर्तमान विधान के अनुसार दत्तक पुत्र विधवा की, जिस ने उसे गोद में लिया है, सारी सम्पत्ति पर अधिकार रख सकता था और इस के कारण बड़ी मुकदमेवाजी होती रहती थी और गोद लेने वाली विधवा की अवस्था बड़ी दयनीय हो जाती थी। अब धारा 68 में इस सम्बन्ध में कहा गया है कि : (1) जहां पर कि इस कोड के आरम्भ होने के बाद कभी विधवा गोद लेती है उस द्वारा गोद लिया हुआ पुत्र:µ
(अ) उस विधवा या उस की सौत विधवाओं (यदि कोई है) द्वारा उसके गोद लेने वाले पिता के वारिस होने के रूप में ऐसी जायजाद में से, जो कि उस गोद लेने के कार्य के पहले सन्निहित काल में विद्यमान थी, उत्तराधिकार में प्राप्त की गई थी, उस का आधा लेगा।
आशा है विचारशील जनता द्वारा इस नवीन नियम का जो अनुभव से लाभ उठा कर विधवा के प्रति सहानुभूति की भावना से बनाया गया है, स्वागत व अभिनन्दन किया जायेगा।
नाबालिग और उसके संरक्षक के सम्बन्ध में जो धाराएं भाग 4 में दी गई हैं, उनके सम्बन्ध में अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं। धारा 78 में हिन्दू नाबालिग (अल्पवयस्क) के स्वाभाविक संरक्षक के विषय में कहा गया है:µ
किसी नाबालिग हिन्दू की निजता (फयतहण) तथा उसके साथ साथ उसकी सम्पत्ति के मामले में उसके स्वाभाविक संरक्षक हैंµ
(आ) किसी बालक या अविवाहित कन्या के मामले में पिता और उस के बाद माता, किन्तु शर्त, यह है कि ऐसे नाबालिग का संरक्षण (धगतवहनख) जो कि अपनी आयु के तीन वर्ष समाप्त नहीं कर पाया है साधारणतया उसकी माता का होगा।
(इ) किसी नाजायज बालक अथवा अविवाहित कन्या के मामले में माता और उसके बाद पिता।