Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 570

ANNEXURE II 1347

(उ) किसी विवाहित लड़की के मामले में उसका पति किन्तु शर्त यह है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति इस धारा के विधानों के अधीन किसी नाबालिग का संरक्षक होने का अधिकार नहीं रखेगा।
(अ) यदि वह हिन्दू धर्म को त्याग चुका है।
(इ) यदि वह पूर्णतया और अन्तिम रूप में धारा 110 की उपधारा (1) में वणित रीतियों में से किसी रीति अनुसार संसार को त्याग चुका है।
धारा 81 में बताया गया है कि जहां स्वाभाविक संरक्षक हिन्दू धर्म को त्याग चुका है वहां उसकी अधिकार सत्ता का खंडन हो जायेगा। धारा 83 में बताया गया है कि किसी नाबालिग हिन्दू के संरक्षक का कर्तव्य होगा कि वह ऐसे नाबालिग का हिन्दू के रूप में पालन पोषण करे कोई भी हिन्दू धर्म से प्रेम रखने वाला व्यक्ति हिन्दुत्व पोषक इन धाराओं का अभिनन्दन किये बिना नहीं रह सकता। एक और बात जिसका इस प्रसंग में उल्लेख और समर्थन मुझे आवश्यक प्रतीत होता है वह नाबालिग बच्चों पर माता के अधिकार की स्वीकृति विषयक है। अब तक के विधान में यह ज्ञात हुआ है कि इसकी उपेक्षा की जाती थी, यद्यपि शास्त्रें के अनुसार माता का स्थान सबसे ऊंचा है। यहां तक कि मनुस्मृति अ- 2 श्लोक 145 में लिखा है कि ‘ उपाध्यायान् दशाचार्य: आचार्याणां शतं पिता सहस्रतु पितृन्माता, गौरवेणातिरिच्यते। ’ अर्थात आचार्य का स्थान
10 उपाध्यायों से भी बढ़ कर है, पिता का गौरव 100 आचार्यों और माता का 1000 पिताओं से भी बढ़ कर है।
इस दृष्टि से इन उपर उद्धृत धाराओं और धारा 82 के इस अंश का कि ‘किन्तु शर्त यह है कि इस धारा में किसी भी ऐसी बात का होना नहीं विचारा जायेगा जो किसी भी व्यक्ति के संरक्षक का कार्य पूरा करने के लिए साधिकार कर सके यदि ऐसे नाबालिग की माता जीवित है और अपने ऐसे नाबालिग बच्चे की स्वाभाविक संरक्षिका होने की क्षमता या योग्यता रखती है।’ हम अभिनन्दन करते हैं।

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