Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 572
ANNEXURE II 1349
(2) जहां ऐसी स्त्री के अतिरिक्त कि जिसका इस प्रकार विवाह संस्कार सम्पन्न किया गया है किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई स्त्रीधन प्राप्त किया जाता है, तो उस अवस्था में ऐसे व्यक्ति को वह अपने पास उस स्त्री के लाभ तथा व्यक्तिगत उपयोग के लिए एक अमानत के रूप में रखना होगा तथा जब वह स्त्री अपनी आयु का 18वां वर्ष पूरा करे तब दे देना होगा और यदि वह अपनी आयु की उक्त अवधि पूरी करने से पहले ही मर जाए तो भाग 7 में निश्चित किये गये उस के उत्तराधिकारियों के नाम परिवर्तित कर देना होगा। इन धाराओं में निर्दिष्ट वस्तु गंभ्भीरता से विचार योग्य है।
सम्राज्ञी श्वशुरे भव साम्रज्ञीश्वश्र वां भव । ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ।।
10/85/45
यथा सिन्धुनदीनां साम्राज्यं सुपुवे वृषा । एवं त्वं सम्राज्ञेधि पत्युरस्तं परेत्य।
(अथर्व- 14/1/43)
वेदों में पत्नी का स्थान बहुत उच्च माना गया है तथा उस के लिए अनेक वेद मन्त्रें में सम्राज्ञी शब्द का प्रयोग किया गया है जिस का अर्थ सम्$राज्ञी अपने गुणों से भली भांति चमकने वाली और रानी होता है।
यह मन्त्र इस विषय में विशेष रूप से द्रष्टव्य है। सम$राज्ञी का अर्थ सम्=मिलकर (पति से मिलकर) अथवा उसके साथ राज्य करने वाली यह भी होता है। इन मन्त्रें में नव वधू को सम्बोधित करते हुए घर की सम्राज्ञी बनने का आदेश व आशीर्वाद दिया गया है और अपने श्वसुर, देवर, ननद, सास आदि सब सम्बन्धियों को सद्व्यवहार से प्रसन्न करने अथवा अपने गुणों से चमकने का उपदेश दिया गया है। ‘गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथास:।’ (ऋ- 10/85/16) तथा ‘अस्मिन् गृहे गार्दपत्याय जागृहि’ (ऋ- 10/85/27) इत्यादि मन्त्रें में भी स्त्री को गृह पत्नी अथवा घर की स्वामिनी बनने का उपदेश व आदेश है। ‘आशसाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम् । पत्युरनव्रता भूत्वा संनह्यस्वामृताय कम् ।।’ अथर्व (14/1/42) ‘रथा सहस्प वर्चसा, इमौ स्तामनुपक्षितौ’ (अ- 3/78/2) इत्यादि मन्त्रें में भी वधु को कहा गया है कि तुम पति से प्रेम, प्रसन्नता, सन्तान, सौभाग्य, ऐश्वर्य की कामना करती हुई उसकी अनुव्रता हो कर सुख प्राप्त करो। ये दोनों (पति-पत्नी) सब प्रकार से धन से भरपूर हों। इस प्रकार हम देखते हैं कि वेद स्ति्रयों के प्रति उच्च भाव दर्शाते हुए उनका पति की सम्पत्ति तथा समस्त सुख साधनों में समान अधिकार का निर्देश करते हैं।
मध्यकालीन साहित्य में स्ति्रयों की स्थिति को हम अनेक अंशों में गिरा हुआ पाते हैं। ‘अनृतं स्त्री’, ‘निरिन्दि्रया ह्यमंत्रश्च स्ति्रयो{नृतमिति स्थिति:।।’ तथा ‘विश्वासपात्रं न किमस्ति नारी’ (श्री शंकराचार्य कृत प्रश्नोत्तरी) इत्यादि वाक्य हमें उस काल की अनेक स्मृतियों तथा अन्य ग्रन्थों में दिखाई देते हैं जिनमें स्ति्रयों को अविश्वसनीय, असत्यस्वरूपिणी तथा अशुभा मानकर उनको सर्वथा अस्वतन्त्र तथा शूद्र व दासी समान माना गया है, कितु ऐसे वेद विरुद्ध वचनों को चाहे वे किसी भी मुनि के नाम पर निर्मित