1350 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
ग्रंथ में पाये जाएँ, मानने से हमें सर्वथा इन्कार कर देना चाहिए क्योंकि वेद विरुद्ध होने के अतिरिक्त वे न्याय बुद्धि के भी विपरीत हैं। दु:ख की बात यह है कि ऐसे स्ति्रयों के प्रति हीनता और अविश्वास सूचक भाव लोगों के हृदयों में घर किए हुए हैं और इन विषयों पर जब कभी विचार किया जाता है तो प्राय: पुरुषों के मुख से इस प्रकार के अविश्वाससूचक वाक्य ही निकलते हैं। जैसे कि मैंने इन दिनों अनेक सुशिक्षित महानुभावों से भी बातचीत करके देखा है।
स्ति्रयों के सम्पत्ति में अधिकार के सम्बन्ध में शास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हुए हमें स्त्रीधन के स्वरूप को समझ लेने की आवश्यकता है। जिस पर प्राय: सभी स्मृतिकारों ने पूर्ण अधिकार स्वीकार किया है। मनुस्मृति 9/194 में स्त्रीधन का स्वरूप इस प्रकार बताया गया हैµ
अध्यग्न्यध्यावाहनिकं, दत्तं्च प्रीतिकर्मणि । भ्रातृमातृ पितृ प्राप्तं ‘षड्विधं स्ति्रधनं स्मृतम् ।।
अर्थात विवाह के समय में अग्नि के समक्ष जो धन स्त्री को दिया जाता है, पति के गृह से जब पिता के घर स्त्री जाती है उस समय श्वशुरादि से जो प्राप्त होता है, पति द्वारा जो प्रेमोपहार रूप में दिया जाता है तथा भाई, माता और पिता द्वारा समय पर जो कुछ प्राप्त होता है, यह 6 प्रकार का स्त्रीधन माना जाता है। याज्ञवल्क्यस्मृति 2/143 में ‘पितृ मातृ पति भ्रातृदत्त मध्यग्न्युपागतम् अधिवेदनिकाद्य च, स्त्रीधनं परिकीर्तितम्।।’ इस श्लोक में स्त्रीधन का स्वरूप प्राय: मनुस्मृति के समान ही बताते हुए आदि शब्द का प्रयोग किया गया है। जिसकी व्याख्या में विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा टीका में लिखा है कि ‘आद्य शब्देन रिक्थक्रयसंविभागपरिग्रहाधिगमप्राप्तमेतन् स्त्री धनं मन्वादिभिरुक्तम्।’ (याज्ञवल्क्य स्मृति मिताक्षरा, सुबोधिनी बाल भटयादी टीका सहित मद्रास पृ- 842) अर्थात् ð आदि शब्द से दाय भाग, खरीद बंटवारा, लाभ तथा अन्य प्रकार से प्राप्त धन, ग्रहण है।
नारदस्मृति में भी ‘अध्यग्न्यध्यावाहनिकं, भर्तृदायस्तथैव च ! भ्रातृदत्तं पितृभ्यांच, षडविधं स्त्रीधनं स्मृतम ।।।’ (ना- स्मृ- 13/8) इन शब्दों में मनुस्मृति के समान स्त्रीधन का स्वरूप बताया गया है। भर्तृदाय शब्द का स्पष्ट रूप से वहां प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ पति द्वारा प्रदत्त है।
इस स्त्रीधन पर स्ति्रयों का पूर्ण अधिकार प्राय: स्मृतिकारों तथा महाभारतकार ने स्वीकार किया है, महाभारत 18/1 में कहा है :
स्त्री धनस्पेशिनी स्त्री स्पाद, भर्ताच तदनुज्ञया । भोक्तु ‘रक्षयितु’ ‘योम्यो भर्तु’ नाशयितु न च ।।
अर्थात स्त्रीधन की स्वामिनी स्त्री है। उसकी अनुमति से ही पति विशेष अवस्थाओं में उसका उपयोग कर सकता है अन्यथा नहीं । यहां तक कि इस विषय में लिखा है:
‘न भर्ता नैवं च सुतो न पिता भ्रातरों न च । आदाने वा विसर्गे वा, स्त्रीधने प्रभविष्णव: ।।’
(दायभाग 78 स्मृति चन्दि्रका 282 पराशर माधवीय 556)