Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 574

ANNEXURE II 1351

अर्थात् स्त्रीधन को लेने और उसको बेचने आदि का अधिकार पति, पुत्र, पिता, भ्राता आदि किसी को भी नहीं है।
सौदायिक धन का लक्षण शुक्रनीति 4/793 में इस प्रकार किया गया है :
ऊढया कन्यया वापि, पत्यु: पितृगृहे{पिवा। भ्रातु: सकाशात्पित्रेर्बा, लब्धं सौदायिकं स्मृतम् । (स्मृतिसार 60, स्मृति चन्दि्रका 282, पराशर माधवीय 549)
अर्थात् विवाहिता अथवा अविवाहिता कन्या पति व पिता के घर से अथवा भाई और माता-पिता के पास से जो कुछ प्राप्त करती है उसे सौदायिक कहते हैं। उस सौदायिक धन के विषय में शास्त्रकारों ने कहा है :
सौदायिकं धनं प्राप्य, स्त्रीणां स्वातं=यमिष्यते। यस्मात्तदातृशंस्पार्थ, तैर्दत्तमुपजीवनम् ।।
सौदायिके सदा स्त्रीणां, स्वातं=यं प्ररिकीर्तितम्! विक्रये चैव दाने च, यथेष्ट स्थावरेप्वपि।।
(शुक्रनीति 4/792-93 कात्यायनस्मृति, दायभाग 76, स्मृति चन्दि्रका 282, पराशर माधवीय 549)
अर्थात्, सौदायिक धन में स्ति्रयों को सदा पूर्ण स्वतन्त्रता है। उसको बेचने और दान करने का और स्थावर सम्पत्ति-भूमि आदि के विषय में भी यथेष्ट व इच्छानुसार कार्य करने का उन्हें पूर्ण अधिकार है।

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