1352 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-7)
सम्पत्ति में स्ति्रयों के अधिकार
(उत्तरार्ध)
पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
प्रस्तुत हिन्दू कोड बिल में स्ति्रयों के सम्पत्ति विषयक अधिकार के विषय में इस लेख के पूर्वार्ध में उद्धृत धाराओं में जो कुछ कहा गया है वह इन श्लोकों में दिए भाव के सर्वथा अनुकूल है अत: इन प्रस्तावों को शास्त्रविरुद्ध बताना सर्वथा असत्य प्रमाणित होता है। किन्तु इस विषय में स्मृतिकारों का भी परस्पर मतभेद अवश्य है, विशेषत: इस विषय में कि विधवाओं का पति की चल और अचल सम्पत्ति में अधिकार सीमित होना चाहिए अथवा पूर्ण। उदाहरणार्थ नारद स्मृति में लिखा है:
भर्त्र प्रीतेन यद्दत्तं, स्ति्रयै तस्मिन् मृते{पितत्।
सा यथा काममश्नीयाद् दद्याद्वा स्थावराद्दते ।।
(नारद स्मृति-व्यवहार मयूख पृ- 97 में उद्धृत वचन)
अर्थात पति ने पत्नी को प्रेमपूर्वक जो कुछ दिया हो उसके मरने पर वह उस धन का इच्छानुसार उपयोग करे अथवा उसे दान दे किन्तु स्थावर या अचल सम्पत्ति के विषय में उसे यह अधिकार प्राप्त नहीं है।
एक दूसरे स्थान पर भी 2/144 में नारद ने यही बात कही है:
अपुत्र शयनं भर्तु: पालयन्ती गुरौ स्थिता।
भुंजीतामरणात्क्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयु: ।।
अर्थात पुत्र रहिता पवित्रचरण वाली विधवा क्षमाशीला होकर मरणपर्यंत पति की सम्पत्ति का उपभोग करे। उसके पश्चात वह सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों को मिले।
महाभारत अनुशासन पर्व 47/23-24 में लिखा है :
त्रिसहस्रपरोदाय:, स्ति्रयै देयो धनस्य वै।
भर्त्र तच्च धनं दत्तं यथार्ह भोक्तुमर्हति ।
स्त्रीणां च पतिदायाद्यम्, उपभोगफलं स्मृतम् ।।
अर्थात् पति को चाहिये कि वह पत्नी को 3000 से अधिक कार्षापण (एक सिक्का जिसका ठीक परिणाम हमें अभी तक ज्ञात नहीं हो सका) दायरूप में दे दे और वह पति के दिये उस धन का यथोचित रूप से उपभोग कर सकती है। पति का दिया धन व सम्पत्ति उपभोग फल अर्थात जीवितकाल तक उपयोग के लिये ही है।
यही बात कौटलीय अर्थशास्त्रकार ने
‘अपुत्र पतिशयनं पालयन्ती गुरूसमीपे स्त्रीधनम् आ आयु: क्षयाद् भु×जीत । अपदर्थं हि स्त्रीधनम् । उर्ध्वं दायादं गच्छेत् ।। कौ- 3/2 में कही है।