Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 576

ANNEXURE II 1353

इसमें भी विधवा को आयुपर्यन्त पति की सम्पत्ति के भोग का अधिकार दिया गया है। इसके पश्चात् वह उसके उत्तराधिकारियों को मिले । याज्ञवल्क्य स्मृति 2/16 की मिताक्षरा टीका में विज्ञानेश्वर का पुत्र रहित पति की सम्पत्ति पर पूर्णाधिकारµ
‘तस्मादपुत्रस्य स्वर्यातस्यासंसृष्टिनी धनं परिणीता स्त्री संयता सकलमेव गृहाति।’
इन शब्दों द्वारा प्रकट किया है। अर्थात पुत्ररहित, सम्मिलित कुटुम्ब से विभक्त पति की संयमशीला साध्वी पत्नी सारा धन संग्रह करती है।
इस प्रकार स्मृतिकारों तथा निबन्धकारों का परस्पर मतभेद इस विषय में स्पष्ट है। अत: व्यावहारिक दृष्टि से भी इस पर विचार आवश्यक है।
जो लोग हिन्दू कोड बिल में वर्णित धाराओं के विरोधी हैं उनमें से अधिकतर लोगों का यह कहना है कि स्ति्रयां सम्पत्ति का प्रबन्ध करने में असमर्थ होती हैं अत: उनको पूर्णाधिकार देना ठीक न होगा। इस से न केवल उनको, प्रत्युत उन के कुल को भी हानि होगी। वस्तुत: यह बात अनुभव के आधार पर सत्य नहीं प्रमाणित होती। बम्बई में जहां कन्याओं को पिता की सम्पत्ति में पूर्णाधिकार प्राप्त है, कहा जाता है कि, उन्होंने सम्पत्ति के प्रबन्ध में पुरुषों से भी अधिक योग्यता का प्राय: परिचय दिया है। एक बात प्रस्ताव के विरुद्ध यह कही जाती है कि स्ति्रयों में केवल 3 प्रतिशत शिक्षिता हैं, शेष 97 प्रतिशत अशिक्षित हैं। अत: इस प्रकार का अधिकार देना उनके लिए अत्यन्त हानिकारक सिद्ध होगा। यह युक्ति कुछ अंश तक ठीक प्रतीत होती है, कितु इसके अनुसार पुरुषों में से भी केवल 10 प्रतिशत के लगभग शिक्षित और शेष अशिक्षित हैं अत: उन 90 प्रतिशत लोगों को भी वह अधिकार न देना चाहिए । हिन्दू विश्व विद्यालय काशी के एक सुयोग्य उपाध्याय डॉ- अनंत सदाशिव अलतेकर ने अपनी पुस्तक ( The position of

women in Hindu civilisation ) में यह सुझाव रक्खा है कि स्ति्रयों को सम्पत्ति पर

पूर्णाधिकार देने के लिए शिक्षा का मानदण्ड नियत कर देना चाहिए। उस शिक्षा योग्यता से सम्पन्न महिलाएं ही उस अधिकार का उपयोग कर सकें, अन्य नहीं। यह प्रस्ताव मुझे भी उपादय प्रतीत होता है इससे यह अवश्य होगा कि जो युक्ति अशिक्षिता होने के कारण स्ति्रयों के ठगे जाने की दी जाती है वह निर्बल हो जाएगी । किन्तु उस अवस्था में क्या पुरुषों के अधिकार पर भी ऐसा प्रतिबन्ध लगाना न्यायसंगत न होगा?
एक भय यह प्रकट किया जाता है कि यदि विधवाओं को पति की चल, अचल दोनों प्रकार की सम्पत्ति में पूर्णाधिकार दिया जाएगा तो इसका दुरुपयोग होने की संभावना बहुत अधिक है। अत: एक प्रस्ताव यह किया जाता है। जैसे कि श्री चांदकरण शारदा जी ने हिंदू ला कमेटी के सामने साक्षी देते हुए किया था, कि चल सम्पत्ति में स्ति्रयों को पूर्णाधिकार दिया जाय किन्तु अचल सम्पत्ति में अधिकार जिससे वह उस परिवार में ही रहे। यह प्रस्ताव भी मुझे उत्तम और स्वीकरणीय प्रतीत होता है यद्यपि उपर्युक्त संभावना इससे सर्वथा दूर हो जाएगी ऐसा नहीं कहा जा सकता। एक प्रस्ताव यह भी है कि जहां सन्तान तथा अन्य उत्तराधिकारी न हों वहीं विधवाओं को पति की सम्पत्ति पर पूर्णाधिकार दिया जाए अन्यथा नहीं। मुझे तो इसकी अपेक्षा भी पूर्वाेद्धृत प्रस्ताव ही