ANNEXURE II 1353
इसमें भी विधवा को आयुपर्यन्त पति की सम्पत्ति के भोग का अधिकार दिया गया है। इसके पश्चात् वह उसके उत्तराधिकारियों को मिले । याज्ञवल्क्य स्मृति 2/16 की मिताक्षरा टीका में विज्ञानेश्वर का पुत्र रहित पति की सम्पत्ति पर पूर्णाधिकारµ
‘तस्मादपुत्रस्य स्वर्यातस्यासंसृष्टिनी धनं परिणीता स्त्री संयता सकलमेव गृहाति।’
इन शब्दों द्वारा प्रकट किया है। अर्थात पुत्ररहित, सम्मिलित कुटुम्ब से विभक्त पति की संयमशीला साध्वी पत्नी सारा धन संग्रह करती है।
इस प्रकार स्मृतिकारों तथा निबन्धकारों का परस्पर मतभेद इस विषय में स्पष्ट है। अत: व्यावहारिक दृष्टि से भी इस पर विचार आवश्यक है।
जो लोग हिन्दू कोड बिल में वर्णित धाराओं के विरोधी हैं उनमें से अधिकतर लोगों का यह कहना है कि स्ति्रयां सम्पत्ति का प्रबन्ध करने में असमर्थ होती हैं अत: उनको पूर्णाधिकार देना ठीक न होगा। इस से न केवल उनको, प्रत्युत उन के कुल को भी हानि होगी। वस्तुत: यह बात अनुभव के आधार पर सत्य नहीं प्रमाणित होती। बम्बई में जहां कन्याओं को पिता की सम्पत्ति में पूर्णाधिकार प्राप्त है, कहा जाता है कि, उन्होंने सम्पत्ति के प्रबन्ध में पुरुषों से भी अधिक योग्यता का प्राय: परिचय दिया है। एक बात प्रस्ताव के विरुद्ध यह कही जाती है कि स्ति्रयों में केवल 3 प्रतिशत शिक्षिता हैं, शेष 97 प्रतिशत अशिक्षित हैं। अत: इस प्रकार का अधिकार देना उनके लिए अत्यन्त हानिकारक सिद्ध होगा। यह युक्ति कुछ अंश तक ठीक प्रतीत होती है, कितु इसके अनुसार पुरुषों में से भी केवल 10 प्रतिशत के लगभग शिक्षित और शेष अशिक्षित हैं अत: उन 90 प्रतिशत लोगों को भी वह अधिकार न देना चाहिए । हिन्दू विश्व विद्यालय काशी के एक सुयोग्य उपाध्याय डॉ- अनंत सदाशिव अलतेकर ने अपनी पुस्तक ( The position of
women in Hindu civilisation ) में यह सुझाव रक्खा है कि स्ति्रयों को सम्पत्ति पर