Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 578

ANNEXURE II 1355

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-8)

स्ति्रयों के दायभागाधिकार

पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
स्ति्रयों के सम्पत्ति में अधिकार विषयक धाराओं पर शास्त्रीय तथा व्यावहारिक दृष्टि से कुछ विचार करने के पश्चात अब मैं हिन्दू कोड बिल की धारा 100 में उस अंश पर कुुछ विचार करना चाहता हूं जिसमें किसी वसीयतहीन मृत व्यक्ति की सम्पत्ति के बंटवारे के सम्बन्ध में नियम बतलाते हुए यह कहा गया कि ‘प्रत्येक पुत्री का हिस्सा पुत्र के हिस्से के बराबर होगा’ ।
निस्सन्देह यह अत्यधिक विवादास्पद धारा है जिसके विरुद्ध आंदोलन भी सबसे अधिक किया जा रहा है । यहां तक कहा जा रहा है कि यह सब मुसलमानी प्रथा है जिसे हिदुओं पर लादने का यत्न हो रहा है । इस गम्भीर विषय पर पहले मैं शास्त्रीय दृष्टी से कुछ विचार विद्धानों के समक्ष रखना चाहता हूं । इसके पश्चात् व्यावहारिक दृष्टी से भी इस पर विचार किया जायेगा । जिस रूप में यह धारा प्रस्तुत कोड बिल में रखी गई है कि ‘प्रत्येक पुत्री का हिस्सा पुत्र के बराबर होगा’ मैं उस रूप के पक्ष में नहीं हूं । तथापि यह आवश्यक है कि इन कन्याओं के पैतृक सम्पत्ति में अधिकार की प्रथा का मुसलमानी, सर्वथा अशास्त्रीय तथा धर्मविरुद्ध प्रथा कहने से पूर्व, हम इस पर निष्पक्ष होकर विचार करें और इसमें परिवर्तनार्थ उचित संशोधन प्रस्तुत करें ।
पुत्रियों का पैतृक सम्पत्ति में अधिकार होना चाहिए या नहीं, यदि हां तो किनका और कितना इस पर हमें शास्त्रीय दृष्टि से पृथक् विचार करना उचित होगा । सबसे पूर्व मैं अविवाहित तथा विवाह न कराने वाली पुत्रियों के सम्बन्ध में विचार प्रस्तुत करूंगा । उसके पश्चात् पिता की एकमात्र पुत्री के सम्बन्ध में और अन्त में विवाहिता पुत्रियों के सम्बन्ध में ।
ऋग्वेद 2/17/7 में निम्न मंत्र आया है :
‘‘अमाजूरिव पित्रे: सचा सती समानादा सदसस्त्वामिये भगम् । कृधि प्रकेतमुपमास्याभर तद् मे भागं तन्वो येन मामह: ।। इस मन्त्र का श्री सायनाचार्य आदि सब भाष्यकारों ने इस प्रकार भाष्य किया हैµ
हे इन्द्र अमाजू :µ यावज्जीवं गृह एव जीर्यन्ती पित्रे: सचा-माता-पितृभ्यां सह भवन्ती तयो: शुश्रूषणपरा पतिमलभमान: सती दुहिता (समानात्) आत्मन: पित्रेश्च साधारणात् (सदस:) गृहात्।
गृह उपस्यामव यथा भागं याचति तथा स्तोताहं भगं भजनीयं धनं स्वामिये, त्वां याचे ।।"
इस का तात्पर्य यह है जिस प्रकार जीवनपर्यन्त माता-पिता के घर में भी रह कर अपने भाग को माता-पिता से मांगती है वैसे ही मैं स्तोता तुझ इन्द्र (परमेश्वर) से सेवनीय ऐश्वर्य की प्रार्थना करता हूं । ‘धर्मकोष’ के सम्पादक पं- लक्ष्मण शास्त्री जोशी तर्कतीर्थ ने इस वेद मन्त्र को व्यवहार काण्ड उत्तरार्द्ध पृ- 1415 में उद्धृत करते हुए उसका शीर्षक यह दिया है, ‘अनूढ दुहिता पै=यभागहारिणी पुत्री पैतृक संपत्ति में भाग ग्रहण करने की अधिकारिणी होती है ।’