1356 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
इस विषय में सम्भवत: किसी भी विचारशील व्यक्ति का मतभेद न होगा कि जो किसी भी विशेष उद्देश्य से सुलभा, गार्गी आदि, की तरह नैतिक ब्रह्यचर्य का व्रत धारण करें अथवा अन्य किसी कारण से विवाह न करें उनको पैतृक संपत्ति में से भाग मिलना चाहिए।
सुप्रसिद्ध निरुक्त के प्रणेता श्री यास्काचार्य ने निम्नलिखित वेद मन्त्र पुत्रियों के दाय भाग के सम्बन्ध में उद्धृत किया हैµ
"शासद्वन्हिर्दुहितुर्नर्त्यगाद् विद्वां ऋतस्य दीधिति सपर्यन् ।
पिता यत्र दुहितु: सेकमृंजन्, संशग्म्येन मनसादधन्वे ।।"
(ऋ- 3/31/1)
इस मन्त्र को उद्धृत करने से पूर्व श्री यास्काचार्य ने लिखा है :
"अथैता दुहितृ दायाद उदाहरन्ति पुत्रदायाद इत्येके।"
इसके भाष्य में दुर्गाचार्य ने लिखा है :
"एनां ऋचं शासद् वह्नि: इत्यादी या वक्ष्यमाणा ता दुहितुर्दायादे अर्थ उदाहरन्ति धर्मविद:। अस्याम् ऋचि वक्षयमाणायां दुहितुरपि दायाद्यत्वमस्तीति दृश्यते ।"
अर्थात् शासद् वह्नि: इस ऋचा को जानने वाले पुत्री को दाय भाग का अधिकार है, एस अर्थ में उद्धृत करते हैं । इस ऋचा से ज्ञात होता है कि पुत्री को भी दाय भाग का अधिकार है।
इस मन्त्र का भाष्य करते हुए श्री यास्काचार्य ने लिखा है :
विद्वान ऋतस्य दिमिति सपर्यन् विधानं पूजयन् अर्थात् वेद के विधान का आदर करता हुआ । वह वेद का विधान क्या है इसका यास्काचार्य जी ने आगे इस प्रकार प्रतिपादन किया है जो प्रस्तुत विषय की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है :
अविशेष्ोण मिथुना: पुत्र दायादा इति । तंदेतट ðक् श्लोकाभ्यामभिहितम् अघªवघªात् संभवसि हृदयादधि जायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरद: शतम् ।। इति ।। अविशेष्ोण पुत्रण् ाां दायो भवति धर्मत: 1 मिथुनानां विसर्गादौ मनु:स्वायम्भुवो{ब्रवीत ।।
अर्थात पुत्र और पुत्री दोनों को दायभाग का अधिकार है जैसे कि निम्नलिखित ऋचा में और श्लोक में बताया गया है, जिनका अर्थ यह है कि पुत्र को सम्बोधित करते हुए जो यह कहा जाता है कि तू अघõ-अघõ और हृदय से उत्पन्न होता है अत: मेरी आत्मा के तुल्य है तू सौ वर्षों तक जी, यह पुत्र पुत्री दोनों पर समान रूप से लगता है, यह वचन शत पथ ब्राह्यण 14/9/4/6, साम ब्राह्यण 1/5/17 वृहदारण्यकोषनिषद् 6/4/26, कौषीतकी ब्राह्यणोपनिषद्
2/11, पारस्कर गृह्यसूत्र 1/16/18, हिरण्यकेशी गृह्यसूत्र 2/3/2 इत्यादि में पाया जाता है । इसी के समान निम्न वचन मनुस्मृति 9/130 में हैµ
यथैवात्मा तथा पुत्र:, पुत्रेण दुहिता समा । तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यों धनं हरेत् ।।
अर्थात् पुत्र अपनी आत्मा के समान होता है पुत्री पुत्र के समान होती है । उस आत्मातुल्य पुत्री के होते हुए अन्य कैसे धन ले सकता है ?