Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 580

ANNEXURE II 1357

महाभारत अनुशासन पर्व 45/11 में मनुस्मृति का उपर्युक्त श्लोक ही उद्धृत किया गया है । दूसरा श्लोक जो निरुक्तकार यास्कमुनि ने स्वायम्भुव मनु के विषय में उद्धृत किया है उसका अर्थ यह है कि स्वायम्भुव मनु ने अविशेष या सामान्य रूप से पुत्र और पुत्री दोनों का धर्मानुसार दाय भाग में अधिकार होता है ऐसा सृष्टि के प्रारम्भ में बताया । स्वायम्भुव मनु का ऐसा मत वेद के आधार पर ही होना चाहिए इसलिए निरुक्तकार ने ‘शासद वह्निर्दुहितु:’ इस मन्त्र को उद्धृत किया है ।
निरुक्तकार का मत स्पष्टतया लड़कियों के दाय भाग के अधिकार के पक्ष में ज्ञात होता है यद्यपि ‘न दुहितर इत्येके’ यह लिख कर उन्होंने दूसरा पक्ष उन लोगों का रखा है जो यह कहते हैं कि लड़कियों का दाय भाग में अधिकार नहीं है । यह लिखने की आवश्यकता कि "स्ति्रया: दानविक्रयातिसर्गा विद्यन्ते न पुंस:" अर्थात स्ति्रयों का दान किया जाता है, उन्हें बेचा जाता है और उनका इच्छानुसार त्याग कर दिया जाता है अथवा "तस्मात् स्ति्रयं जातां परास्यन्ति न पुमांसम्" अर्थात् स्त्री (कन्या) के उत्पन्न होने पर उसे फेंक दिया जाता है पुरुष (बालक) को नहीं, ऐसी लचर युक्तियां देकर जो यह सिद्धांत बनाते हैं कि "तस्मात् पुमान् दायाद: अदा यादा स्त्रीति विज्ञायते ।" अर्थात पुरुष को ही दाय भाग का अधिकार है स्त्री को नहीं, उसकी अपेक्षा हमें निरुक्तकार यास्काचार्य का अपना मत अधिक उपादेय प्रतीत होता है । ‘शासद् वह्निर्दुर्हित कम करें :’ यह ऋ- 3/31 का प्रथम मन्त्र जब पुत्री के दाय भाग के अधिकार का समर्थन है तो उसी सूक्त के दूसरे मन्त्र ‘न तान्वो जामये’ का ठीक विरुद्ध अर्थ खींचातानी से लगाना हमें संगत प्रतीत नहीं होता । उसमेें बहुत अधिक
खैंचातानी दाय भाग विरोधियों को करना पड़ता है । ‘मातर:’ का अर्थ माता-पिता ‘वह्नि’ का अर्थ पुरुष करके उसके साथ जबरदस्ती अवन्हि जोड कर स्त्री, एक शुभ कर्म का कर्त्ता अर्थात् पिण्ड देने वाला पुरुष और दूसरी केवल अलंकृत होने वाली स्त्री इत्यादि अर्थ कल्पित करने पड़ते हैं । निरुक्तकार ने अपना पक्ष पहले दिखा कर इस पक्ष का निर्देश मात्र कर दिया है । महर्षि दयानन्द जी ने इसकी व्याख्या अग्नि, विद्या तथा सन्तान रक्षादि के सम्बन्ध में की है, जिसका भगिनी को भाग न देने से कोई सम्बन्ध नहीं । वेद में इस प्रकार एक ही सूक्त में परस्पर विरुद्ध दो आदेश हैं, यह कौन वेद प्रेमी स्वीकार कर सकता है ? सायणाचार्य आदि भाष्यकार क्योंकि पौराणिक विचारों के थे अत: उन्होंने स्पष्ट लिख दिया कि पिण्डदानादिकर्तृत्वात् पुत्रेदायार्ह: दुहिता तथा नेति न दायार्हा’ ¹3/31/2 सायण भाष्यह् अर्थात् पुत्र क्योंकि मृत पितरों को पिण्ड देता है इसलिए वह दाय भाग का अधिकारी है परन्तु पुत्री पिण्ड नहीं देती इसलिए उसको दाय भाग का अधिकार नहीं । ऐसी ही बात प्राय: सभी पौराणिक भाष्यकारों ने लिखी है । कइयों ने स्ति्रयों के प्रति अत्यन्त तुच्छ भाव प्रकट करते हुए उनका दाय भाग में अनधिकार माना है । जैसे कि सरस्वती विलासकार ने 363 पृ- में लिखा है, "स्त्रीयां दाय विभागो नास्ति निरिन्दि्रयत्वात्" अर्थात स्ति्रयों का दाय विभाग में अधिकार इसलिए नहीं क्योंकि वे इन्दि्रयशून्या होती हैं ।
पण्डित सदायतन पाण्डेय प्रधान संयुक्त प्रांतीय धर्मसंघ ने राव कमेटी के सम्मुख साक्षी देते हुए पुत्रियों के दाय भाग मे विरुद्ध यही युक्ति दी । लड़की को जो पिता के श्राद्ध तथा पिण्ड-दान आदि में कोई भाग नहीं लेती लड़के के साथ जिसको इन कर्तव्यों का पालन करना होता है दाय भाग में अधिकार देना सर्वथा अनुचित होगा (देखो हिन्दू ला