Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 582

ANNEXURE II 1359

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-9)

स्ति्रयों का दायभाग और स्मृतियां

पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
अब मैं इस सम्बन्ध में प्राप्त होने वाले स्मृत्यादि ग्रन्थों के वचनों को विद्वानों के सम्मुख रखना चाहता हूं ।
मनुस्मृति 9/118 में निम्न श्लोक पाया जाता है :
स्वेभ्योंशेभ्यस्तु कन्याभ्य: प्रदद्युर्भ्रातर: पृथक् । स्वात्स्वादंशाच्चतुर्भागं, पतित: स्युरदित्सव: ।।
(मनु- 9/118)
अर्थात भाइयों को चाहिए कि अपने अपने हिस्से में से चतुर्थ भाग वे पृथव्फ़ भाग वे पृथव्फ़ 2 कन्याओं अर्थात् अपनी अविवाहित भगिनियों को दें । जो न देना चाहें वे पतित समझे जाएं ।
इस वचन में कन्याओं का लड़कों से चतुर्थ भाग लेने को अधिकार स्पष्ट तथा प्रतिपादित है।
याज्ञवल्क्य स्मृति 2/12 में भी यही बात
असंस्कृतास्तु संस्कार्या भ्रातृभि: पूर्णसंस्कृतै: । भगिन्यश्व निजावंशाददृत्वांशं तु तुरीयकम् ।।
इस श्लोक द्वारा कही गई है । इस श्लोक की मिताक्षरा टीका में विज्ञानेश् ने लिखा है कि ‘अनेक दूहितरोपि पितुरुर्ध्वमंशभागिन्य इति गम्यते । अर्थात् इससे ज्ञात होता है कि पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्रियों का भी दाय भाग में अधिकार है । इसी टीका में आगे लिखा है कि "नच निजादंशाद् तुरीयकम् इति तुरीयांशविवक्षया संस्कार मात्रेपयोगि द्रव्यं दत्वेति व्याख्यान युत्तफ़म् । मनुवचन विरोधात् । तस्नात् पितुरुर्ध्वं कन्याप्यंशभागिनी पूर्व चेद्यत् किचित् पिता ददाति तदेव लभते विशेषवचनाभावादितिसर्वमनवद्यम् ।"
(मिताक्षरा टीका)
अर्थात् यहां भगिनी को चौथा हिस्सा देने का जो विधान है उसका यह अर्थ न समझा जाए कि संस्कार के उपयोगी द्रव्य से ही यहां प्रयोजन है, चतुर्थ भाग देने से नहीं क्योंकि ऐसा मानने से मनुस्मृति (9/118) के वचन से विरोध हो जाएगा । इस लिए यह स्पष्ट है कि पिता की मृत्यु के बाद कन्या का भी उसकी सम्पत्ति में अधिकार है । जीवित काल में तो पिता कन्या को जो कुछ देता है वह उसे प्राप्त करती है । विश्वे श्वर भट्टप्रणीत मदन पारिजात नामक सुप्रसिद्ध निबन्ध ग्रन्थ में याज्ञवल्क्य स्मृति के इस श्लोक की व्याख्या करते हुए स्पष्ट लिखा है कि "भगिन्यश्च इत्यादेस्यं तात्पर्यार्थ:। भगिनीनामसंस्कृतानां विवाहं कृत्वा ताभ्यश्चतुर्थमंशं दद्यात् ।" (मदन पारिजात 648) अर्थात् ‘भगिन्यश्च’ इत्यादि याज्ञवल्क्य वचन का तात्पर्य यह है कि अविवाहिता भगिनियों का विवाह संस्कार करा कर फिर उनको अपने भाग का चौथा हिस्सा दे ।
जो लोग यह मानते हैं कि भगिनी को चतुर्थ अंश केवल विवाह-संस्कारार्थ दिया जाता है, इस मत का खण्डन करते हुए मदनपारिजात में आगे लिखा है कि "केचन एवं मन्यन्ते, पूर्वोत्तफ़रीत्या चतुर्थमंश कन्यकायै दत्वा तेनैव विवाह: कर्तव्यो न तु समुदित द्रव्येण विवाहं कृत्वा पुनरपि चतुर्थांशदानमिति तन्मेधातिथिमिताक्षराकारादीनामनभिमतत्वादुपेक्षणीयम् ।" (मदन पारिजात 650) अर्थात् कई ऐसा मानते हैं कि पूर्वोक्त प्रकार कन्यों को अपना चौथा