1360 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
हिस्सा देकर उसी से उनका विवाह करना चाहिए न कि एकत्रित व संयुक्त द्रव्य से विवाह करके फिर उनको चौथा हिस्सा देना चाहिए । यह मत मेधातिथि, मिताक्षराकार विज्ञानेश्वर इत्यादि के विरुद्ध होने के कारण उपेक्षा करने योग्य है । व्यवहार काण्ड (देखो धर्मकोष पृ- 1420)
बालम्भटीð नामक याज्ञवल्क्य स्मृति की टीका में भी यही बात कही गई है कि "केचिदुत्तफ़री-त्यैव तुरीयमंशं कन्यायै दत्वा तेनैव विवाह: कार्यो न तु समुदितद्रव्येण विवाहों{शदानं च पृथगित्याहु:। तन्मतं खण्डयति । न चेति एतेन देशाचाराद् व्यवस्थेतिमद नपारिजातायुत्तफ़मपास्तम् ।" (बालम्भट्टी--धर्मकोष पृ- 1421) अर्थात् जो यह कहते हैं कि कन्या को उक्तरीति से चौथा भाग देकर उसी से विवाह करना चाहिए न कि संयुक्त द्रव्य से विवाह संस्कार करा कर चौथा भाग पृथव्फ़ देना चाहिए उनके मत का ‘नच’ इत्यादि के द्वारा मिताक्षराकार ने खण्डन किया है । मदन पारिजात ने अन्त में जो यह लिख दिया था कि ‘अथवा देशाचार से इसकी व्यवस्था हो जायेगी उसका भी इससे खण्डन हो जाता है ।
इस विषय को कुछ विस्तार में लिखने की आवश्यकता इसलिए हुई कि प्राय: पौराणिक पण्डित मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट प्रतिपादित चतुर्थ भाग देने का तात्पर्य केवल विवाह संस्कारार्थ बताकर टालमटोल का यत्न करते हैं उसकी निस्सारता और अयथार्थता विद्वानों को ज्ञात हो जाये । अब इस सम्बन्ध में अन्य स्मृत्यादि वचनों को देखिए ।
(7) नारद संहिता 14/13 में लिखा है :µ
ज्येष्ठायांशो{धिको ज्ञेय:, कनिष्ठायावर: स्मृत: । समांशभाग: शेषा: स्यु:, अप्रत्ता भगिनी तथा ।। अर्थात् ज्येष्ठ भ्राता को कुछ अंश अधिक देना चाहिए, सबसे छोटे को कम । शेष भाईयों और अविवाहिता बहिन को बराबर बांटना चाहिए ।
यहां अविवाहिता बहिन को पैतृक सम्पत्ति में से मध्य वाले भाइयों के बराबर भाग देने का विधान है ।
(8) कात्यायन स्मृति में निम्न श्लोक है : "कन्यकानां स्वदत्तानां_ चतुर्थो भाग इप्यते । पुत्रणा च त्रयोभागा:, साम्यं स्वल्पधने स्मृतम् ।।" (देखो दाय भाग 69, स्मृति चन्दि्रका 268) अर्थात् अविवाहिता कन्याओं का पैतृक सम्पत्ति में चौथा भाग रहता है शेष पुत्रें का 3/4 । जब वह धन थोड़ा हो तो कन्याओं का भी पुत्रें के समान धन पर अधिकार रहता है ।
(9) बृहस्पति स्मृति में इस विषय में लिखा है कि ‘तदभावे तु जननी, तनयांशसमांशिनी । समांशा मातरस्तेषां, तुरीयांशा च कन्यका ।।’ (दाय भाग 69 स्मृतिसार 57 वीर मित्रेदय
2/117 धर्मकोष पृ- 1413) अर्थात पिता के मरने पर उसकी पत्नी का भाग अपने लड़कों के बराबर और कन्या का चौथा होना चाहिए ।
(10) विष्णुस्मृति 18/34, 35 में लिखा है : ‘मात:पुत्र भागानुसारेण भागहारिण्य: अन्दाश्च दुहितर:।।" (दाय भाग 68, सरस्वती विलास 357) अर्थात् माता का भाग पुत्रें के अनुसार होता है और अविवाहिता पुत्रियों का भी एक अन्य स्थान पर जिसे सरस्वती विलास पृ- 361 और धर्मकोष, व्यवहार कांड, उत्तरार्द्ध पृ- 1416 में उद्धत किया गया है। विष्णु ने कहा है कि ‘अनूढानामप्रतिष्ठितानामेवांशो दातव्य:।’ अर्थात जो पुत्रियां अविवाहिता हों अथवा निर्धना व विधवा हों उन्हें पैतृक सम्पत्ति में से हिस्सा देना चाहिए।