Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 584

ANNEXURE II 1361

(11) वृद्धहारीत स्मृति 7/256 में लिखा है : भगिन्यश्च तुरीयांशं, पैतृकादाहदेद् धनम् । न स्त्रीधनं तु दायाद्वा विभजेरयुनापदि ।। अर्थात् पैतृक धन से बहिनों को अपना चौथा भाग दे । सम्बन्धी बिना विशेष आपत्ति के स्त्री धन का बंटवार न करें ।
(12) देवल स्मृति में निम्न वचन पाया जाता था जिसे दाय भाग 175, स्मृति चन्दि्रका,
268, स्मृतिसार 59 आदि में उद्धत किया गया है :
कन्याभ्यश्च पितृद्रव्यश्च देयं वैवाहिकं वसु ।। इसका अर्थ स्मृतिचन्दि्रकाकार ने यह किया है कि विवाहप्रयोजकं धनं कन्याभ्य: पितृद्रव्याद् देयम् ।। अर्थात् कन्याओं को विवाह के लिए धन पैतृक सम्पत्ति में से देना चाहिए । कितु व्यवहार प्रकाशकार ने इस अर्थ का खण्डन करते हुए लिखा है कि ‘स्मृतिचन्दि्रकाकारस्तु कन्याभ्यश्चेति देववचनपनुसारेण संस्कार मात्रेपयोगि द्रव्यदानमेव मन्यते अत्र वदाम: कन्याभ्य: पितृ द्रव्यदेयमिति पृथग् विधि: । तच्च मन्वाद्यनुरोधाच्चतुर्थाशरुपमेव । वैवाहिकवसु: च देयं इत्यपि पृथग् विधि: ’विभज्यमाने दायाद्ये कन्पाल३ार वैवाहिकं च स्त्रीधनं लभेत्’ इति श३वचनसमानार्थतयां । व्याख्यातं चेदं श३वचनं विद्यारण्यश्री चरणै: पराशर स्मृति टीकायाम्µपैतृकद्रव्यविभाग काले स्वघृतमलघड्ढा रादिकमपि कन्याप्राप्नोतीत्याह श३ इति । यदि तु वैवाहिकं विवाहोपयोगि पितृव्यं कन्याभ्यों देयमित्पर्थ: स्पाद् वसुपदं पुनरुत्तफ़ं स्पादिति पृथग् विधिद्वयमेवात्र युत्तफ़म् । तस्मादस्मदुत्तफ़मेव व्याख्यानमादर्तुमहं नतु विवाहोपयुत्तफ़ द्रव्य परतेत्यवसेयम् ।।
(व्यवहार प्रकाश 456/457, धर्मकोष पृ- 1422) अर्थात् स्मृति चन्दि्रकाकार ने इस वचन का यह जो अर्थ किया है कि कन्याओं को केवल विवाहोपयोगी द्रव्य पिता की सम्पत्ति में से देना चाहिए यह ठीक नहीं है । यहां दो विधान हैं। एक तो यह कि कन्याओं को पैतृक धन देना चाहिए जो मनुस्मृति आदि के अनुसार चौथा हिस्सा है । दूसरी विधि यह है कि कन्याओं को विवाहोपयोगी द्रव्य देने चाहिए जैसे कि श३ स्मृति में भी बताया गया है अन्यथा वसुपद व्यर्थ और पुनरुक्त होता। इसलिए हमारा अर्थ ही मानने योग्य है कि कन्याओं को पिता की सम्पत्ति में से हिस्सा (जो पुत्र का चौथा भाग हो) देना चाहिए और विवाहोपयोगी द्रव्य देने चाहिए।
(13) पैठानसि स्मृति में कहा कि ‘कन्या वैवाहिकं स्त्रीधनं च लभते ।’ (व्यवहारनिण् ार्य तथा व्यवहारार्थ समुच्चय 129 से धर्मकोष पृ- 1422 में उद्धृत)
अर्थात् कन्या विवाहोपयोगी द्रव्य और धन के अतिरिक्त माता के स्त्रीधन को प्राप्त करे ।
(14) स्मृत्यन्तर से निम्न वचन स्मृतिचन्दि्रका 268 और व्यवहारार्थ समुच्चय 129 में उद्धृत किया गया है :µ
भ्रातृभ्यों{शं, चतुर्थांशं तत्र कन्या हरेद्धनम् ।। अर्थात् कन्या प्रत्येक भाई के हिस्से के चौथे भाग को पैतृक सम्पत्ति में से प्राप्त करे ।
(15) कौटलीय अर्थशास्त्र 3/5 में कहा है कि,
रिक्थं पुत्रवत: पुत्र दुहितरो वा धर्मिष्ठेषु विवाहेतु जाता: ।।
अर्थात् सन्तान वाले पिता के धन को उत्तम विवाहविधि से उत्पन्न पुत्र और पुत्रियां प्राप्त करें।