Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 586

ANNEXURE II 1363

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-10)

पुत्रियों के दायभागाधिकार पर विमर्श

(पूर्वार्ध)
पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
पुत्रियों के पैतृक धन में दायभागाधिकार के सम्बन्ध में 16 प्रमाणों द्वारा विवेचन पूर्व लेखों में किया जा चुका है । अन्य भी अनेक प्रमाण इस विषय में उपलब्ध होते हैं किन्तु विस्तार भय से उन सबका उल्लेख करना यहां सम्भव नहीं है । श३ लिखित स्मृति का निम्न वचन इस विषय में अवश्य उल्लेखनीय है जिसका कुछ निर्देश एक उद्धरण में किया जा चुका है:µ
(17) "विभज्यमाने दायाद्ये कन्पाल३ारं वैवाहिकं, स्त्रीधनं च कन्या लभेत ।"
इस का अर्थ यह है कि जब दायभागादि का विभाग किया जाय तो कन्या भूषण, विवाहोपयोगी द्रव्य तथा स्त्रीधन को प्राप्त करे । स्मृतिचन्दि्रका 269/270 में इस वाक्य की व्याख्या में लिखा है, "मातृनिर्विभाज्यमाने कन्या स्वघृतमल३रं, वैवाहिकं तुरीयांशादिधनं स्त्रीधनं च, पित्रदिर्दत्तं लभेतेति ।" यहां पुत्र के चतुर्थ भाग लेने का भी स्मृतिचन्दि्रकाकार ने उल्लेख कर दिया है ।
पिता की सम्पत्ति मेें चतुर्थ भाग लेने के अतिरित्तफ़ मातृधन पर भी पुत्रियों के अधिकार का बहुत सी स्मृतियों तथा महाभारतादि में प्रतिपादन है । उदाहरणार्थ विष्णुस्मृति से निम्न वचन श्री प्रतापरुद्रदेव रचित सरस्वती विलास में उद्धत किया गया है यौतुकं मातु: कुमारी दाय एव । (सरस्वती विलास पृ- 382)।
अर्थात् माता के द्रव्य पर ( यौतुकं अन्योन्यान्वितमोवधूर्वरयोर्देयं यत् तद्ध नम् ) कुमारियों का अधिकार होता है ।
(18) मनुस्मृति 9/192 में मातृधन विभाग के विषय में कहा है:
"जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदरा: । भजेरन् मातृकम् रिक्थम् भगिन्यश्च सनाभय: ।।"
अर्थात् माता के मरने पर उसके धन को भाई और बहिनें बांट लें।
(19) बृहस्पति स्मृति में इस विषय में लिखा हैµ
"स्त्रीधनं तदपत्त्यानां, दुहिता च तदंशिनी । अप्रत्ता चेत्समूढा, तु, लभते मानमात्रकम् ।।" "या तस्य भगिनी सातु, ततों{शं लब्धुमर्हति । अनपत्यस्प धर्मा{यम् अभार्यपितृकस्य च ।।" 26/108 "सा च दत्ता स्वदत्ता वा, सोदरे तु मृते सति । तस्यांशं तु, हरेत्सैव, द्वयोर्व्यक्तं हि कारणम् ।।" 26/109 "सोदर्या विभजेरस्ते, समेत्य सहिता: समम् । भ्रातरो ये च संसृष्टा:, भगिन्यश्च सनाभय: ।।" 26/114