1364 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
इन श्लोकों में कहा गया है कि स्त्रीधन उस मृत स्त्री के पुत्रें का होता है और पुत्री का भी उसमें भाग होता है यदि वह अविवाहित हो । विवाहिता उस में से मान व प्रतिष्ठार्थ द्रव्य प्राप्त कर सकती है । यदि किसी का भाई मर जाए तो उसकी बहिन को भी उसके धन में से भाग मिलना चाहिए । चाहे वह पुत्रिकारूप में दी हुई हो या न हो, भाई के मरने पर उस का भाग उस बहिन को मिलना चाहिए क्योंकि दोनों के जन्म का मूल एक ही है । संसृष्ट व मिली हुई पैतृक सम्पत्ति को भाई-बहिन मिल कर बांट लें।
याज्ञवल्क्य स्मृति 2/117 व्यवहाराध्याय में लिखा है:µ "मातृर्दृहितर: शेषम्, ऋण ताभ्य ऋते{न्वय:"। इस की मिताक्षरा व्याख्या में विज्ञानेश्वर ने लिखा है — मातृकृत्तम् ऋणं पुत्रैरेवापकरणीयं न दुद्वितृभि: ऋणावरिष्टं तु दुहितरो गृहणीयुरिति । युक्तं चैतत् पुमान् पु सोधिके वीर्ये, स्त्रीभवत्यधिके स्ति्रया: इति स्त्रयवयवानां दुहितृषु वाहुल्यात स्त्रीधनं दुहितृगामि पितृधनं पुत्रगामि पित्रवयवानां पुत्रेषु बाहुल्यादिति । तत्रच गौतमेन विशेषो दर्शित: ।
"स्त्रीधन दुहितृणाम् अप्रतिष्ठितानां अप्रतिष्ठिानां च" गौतम धर्मसूत्र 28/25 ।।
अर्थात् माता पर कोई ऋण हो तो उसको चुकाना पुत्रें का कर्त्तव्य है पुत्रियों का नहीं । ऋण को चुका कर जो धन बचे उसको पुत्रियां ले ले । मनु के वचनानुसार लड़कियों मे माता के अवयव का अधिक भाग होने के कारण स्त्रीधन पर लड़कियों का और पिता के धन पर पुत्रें का अधिक अधिकार होता है । इस विषय में गौतम ने इस प्रकार विशेष दर्शाया है कि ‘स्त्रीधन अविवाहिता और अप्रतिष्ठिता अथवा निर्धना लड़कियों का होता है ।’
(21) जहां तक अभ्रातृका का संबंध है, महाभारत अनुशासन पर्व 88/22 में कहा है ‘अभ्रातृका समग्रार्हा, चार्धार्हेत्वपरे विदु:।।
अर्थात् जिसके भाई न हो ऐसी पुत्री का पिता की सारी सम्पत्ति पर अधिकार होता है ऐसा अनेक आचार्यों का मत है । किसी किसी का मत यह है कि उसका आधी सम्पत्ति पर अधिकार है ।
(22) नारद स्मृति 16/50 में ऐसी अभ्रातृका के विषय में कहा है ।
‘पुत्रभावे तु दुहिता, तुल्यसन्तानकारणात् ।
पुत्रश्च हुहिता चोभौ, पितु: सन्तानकारकौ ।।
(नारदीय मनुसंहिता 14/47)
अर्थात् पुत्र के अभाव में पुत्री को पैतृक सम्पत्ति मे पूरा अधिकार होता है कि वह भी पिता की पुत्र के समान ही सन्तान है ।
(23) महाभारत अनुशासनपर्व 45/12 में लिखा है, ‘मातुश्च यौतुके यत्स्यात् कुमारीभाग एव स: ।।’
अर्थात् माता के धन पर कुमारी का अधिकार होता है ।।
(24) बृहस्पति स्मृति 26/132 में कहा हैµ ‘ सद्दशी सद्दशेनोढा, शूश्रषणे रता । कृता{कृता वा पुत्रस्य, पितुर्धनहरी तु सा ।।’