Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 588

ANNEXURE II 1365

अर्थात् जो पुत्री पिता के समान गुणकर्म स्वभाव वाली अपने समान योग्य पति से ब्याही गई हो, साध्वी पतिव्रता हो वह पिता के दाय भाग में अधिकारिणी होती है चाहे उसे पुत्र के रूप में माना गया हो या नहीं । इन वचनों पर निष्पक्ष दृष्टि से विचार करने पर हम इन परिणामों पर पहुंचते हैµ(1) जो कन्याएं आजीवन ब्रह्यचर्य का गार्गी सुलभा आदि की तरह अनुष्ठान करके सामाजिक व राष्ट्रीय सेवा मे अपने को समर्पित कर दे उनका पिता की सम्पत्ति में पुत्रें के समान अधिकार होता है और उन्हें अपने निर्वाहार्थ पुत्र के समान भाग मिलना चाहिए । यदि यह अविवाहित रहना किसी शारीरिक दोषादि के कारण हो तो भी पिता की सम्पत्ति से ऐसी पुत्रियों को भाग मिलना चाहिए ।
(2) पिता की एकमात्र सन्तान पुत्री का पिता की सम्पत्ति पर अपनी माता के होते हुए उसके बराबर अन्यथा पूरा अधिकार है ।
(3) अविवाहिता कन्याओं को पिता की सम्पत्ति में भाइयों के भाग का चौथाई अंश मिलना चाहिए ऐसा मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, देवल, बृहस्पति, कात्यायन, विष्णु वृद्धहारीत आदि प्राय: सभी स्मृतिकारों ने माना है । शुक्राचार्य कन्याओं को पुत्रें का आधा भाग पैतृक सम्पत्ति मे देने के पक्षपाती हैं।
(4) विवाहिता पुत्रियों की भी पिता की सम्पत्ति में अधिकार हो इसका समर्थन करने वाले केवल तीन वचन मेरी दृष्टि में आये हैं । इनमें भी सब विवाहिता पुत्रियों को नहीं केवल अप्रतिष्ठिता अर्थात् निर्धना विवाहिता पुत्रियों को पिता की सम्पत्ति में से पुत्रें का चौथा भाग देने के विधान है । ये वचन विष्णुस्मृति, गौतमधर्मसूत्र और बृहस्पति स्मृति के हैं जिनको मैंने इससे पूर्व लेख में उद्धृत किया है । विष्णु का वचन जो पिछले लेख में छपा है इस प्रकार है:µ ‘अनूढानां अप्रतिष्ठितां एवांशो दातव्य:’ अर्थात अविवाहित और निर्धना पुत्रियों को ही पैतृक सम्पत्ति में से भाग मिलना चाहिए । सुप्रसिद्ध सनातनधर्माभिनामी दाक्षिणात्य विद्वान महामहोपाध्याय पं- अनन्तकृष्ण शास्त्री ने हिंदू ला कमेटी के सामने साक्षी देते हुए कहा था कि याज्ञवल्क्यस्मृति की मेरी व्याख्या के अनुसार एक पुत्री, चाहे वह विवाहिता हो अथवा अविवाहिता, पैतृक सम्पत्ति में से चौथे भाग की, जो विवाह विषयक
खर्च के अतिरिक्त हो, अधिकारिणी है । (देखो हिंदू ला कमेटी रिपोर्ट 1947 पृ- 32)
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मेरा विचार यह है कि अविवाहित कन्याओं को पुत्र के भाग का एक चौथाई पैतृक सम्पत्ति में से देना सर्वथा शास्त्रसम्मत और उचित है । उनके अतिरिक्त निर्धना विवाहिता पुत्रियों को भी पैतृक सम्पत्ति में से भाग लेने का शास्त्रनुसार अधिकार है, यद्यपि इसके निश्चय करने में व्यावहारिक कठिनाइयां अवश्य हैं ।

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