Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 590

ANNEXURE II 1367

का वह कैसा प्रेम होगा जो अपने स्वार्थ या भाग की थोड़ी सी हानि से टूट जायेगा। हम इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि जब बहिन को कोई भाग न दिया जाय तब प्रेम अधिक होगा अन्यथा नहीं।
इस पर भी यदि किन्हीं महानुभावों को यह आशंका हो तो उन्हें अपनी वसीयत में यह लिखा देने का अधिकार है कि हमारी पुत्रियों को सम्पत्ति में कोई भाग न दिया जाए। वह प्रस्ताव केवल वसीयत किए बिना मृत व्यक्ति की सम्पत्ति के विषय में है कि उसकी लड़की को भी भाग मिले, अन्यों के विषय में नहीं। इस बात को प्राय: लोग नहीं जानते अथवा भूल जाते हैं। अपनी वसीयत में कुछ भी निर्देश लिखने का प्रत्येक को अधिकार है, जिसका लड़कियों को पैतृक सम्पत्ति में भाग देने के विरोधी अच्छी प्रकार उपयोग कर सकते हैं ।
यह आक्षेप किया जाता है और उसमें कुछ तथ्य है कि यदि लड़कियों को पैतृक सम्पत्ति विशेषत: चल सम्पत्ति में अधिकार दिया जायेगा तो उससे बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। विवाह के पश्चात् लड़कियां सम्पत्ति को कहां और कैसे ले जाएंगी। इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि भाई बहिनों की सम्पत्ति को खरीद लें। सबसे प्रथम अधिकार उन्हें ही दिया जाए। यही विचार श्रीयुत कन्हैया लाल जी मुंशी आदि कई सुप्रसिद्ध महानुभावों ने प्रकट किया था। एक दूसरा संशोधन इस विषय में यह प्रस्तुत किया जाता है जो हमें उचित ही प्रतीत होता है कि लड़कियों को संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में रहने और उसके उपयोग का अधिकार हो किन्तु उसे अन्यों को बेचने अथवा उसके किसी भाग को किराये पर देने का अधिकार न होना चाहिए।
इस संशोधन को यदि स्वीकार कर लिया जाय तो उपर्युक्त आक्षेप का बहुत कुछ समाधान हो जाता है ।
क्योंकि लड़कियां मृत पितरों के लिए पिण्ड नहीं देतीं अत: उनका पिता की सम्पत्ति में कोई भाग न होना चाहिए यह युक्ति जो मदुरा के राव साहब नरेश ऐÕयर, महामहोपाध्याय चिन्न स्वामी शास्त्री तथा अन्य बहुत से पौराणिक पंडितों ने प्रस्तुत की इतनी निस्कार है कि इस विषय में कुछ भी लिखना अनावश्यक है । विवाह पर जो आडम्बरपूर्ण व्यर्थ व्यय आज कल किए जाते हैं, जिनसे सिवाय अपनी प्रतिष्ठा दिखाने के कोई लाभ नहीं होता प्रत्युत हजारों परिवार सदा के लिए ऋण से दब जाते हैं, उनको कम करके लड़कियों की शिक्षा तथा आपत्ति के समय सहायतार्थ पैतृक सम्पत्ति में से भाग दिलाया जाये तो वह सर्वथा उचित ही होगा । दहेज इत्यादि की हानिकारक और आडम्बरपूर्ण प्रथाएं भी इससे बहुत न्यून हो जायेंगी और लड़कियों को आपत्ति के समय वास्तविक लाभ हो सकेगा। आशा है इन पंक्तियों पर विचारशील लोग गम्भीरता से विचार करेंगे।

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