Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 592
ANNEXURE II 1369
89µसंयुक्त परिवार के सदस्यों की कोड के पहिले की ऋण विषयक जिम्मेदारयों में परिवर्तन नहीं होगा-जहां इस कोड के आरम्भ से पहिले संयुक्त परिवार के नियामक एवं कर्ता द्वारा परिवार के प्रयोजनार्थ कोई कर्जा लिया गया हो तो उस अवस्था में इस कोड में उल्लिखित कोई भी बात संयुक्त परिवार की किसी भी सदस्य की उक्त ऋण चुका देने की जिम्मेदारी पर लागू नहीं होती और ऐसी कोई जिम्मेदारी ऐसे समस्त या किन्हीं भी व्यक्तियों पर जो उसके लिए उत्तरदायी हैं इसी प्रकार और इसी सीमा तक आएद की जायेगी जैसी वह कोड पास न होने की सूरत में की जाती । इत्यादि।
सबसे बड़ी आपत्ति जो इस धाराओं के सम्बन्ध में उठाई जाती है इनके द्वारा संयुक्त परिवार प्रथा का, जो कि अनादि काल से चली आ रही एक धार्मिक प्रथा है, अंत हो जाएगा । हिन्दू कोड बिल पर जो वाद-विवाद पिछले दिनों भारतीय राष्ट्रसंसद में होता रहा है उसको 4 दिन सुनने का अवसर मुझको भी प्राप्त हुआ। मुझे यह देखकर सचमुच आश्चर्य हुआ कि इसके सबसे कट्टर विरोधी एक और प्रकार से कोड विरोधी दल के प्रमुख नेता मौलाना नसीरुद्दीन अहमद हैं । जिन्होेंने पग-पग पर इसकी प्रगति में रोड़े अटकाने का सिर तोड़ यत्न किया और श्रोताओं के नितान्त अरुचि प्रकट करने पर भी 7 घण्टों का भाषण कोड के विरुद्ध दिया। एक कट्टर मुस्लिमलीगी सज्जन के साथ पं- लक्ष्मीकांत मैत्रेय जैसे कट्टर पंथी सनातन धर्माभिमानी का यह गठबंधन सदस्यों और दर्शकों को अवश्य आश्चर्यचकित करने वाला प्रतीत होता है। यदि सचमुच मौलाना नसीरुद्दीन अहमद का हिंदूधर्म, हिंदू सभ्यता तथा प्रथाओं पर इतना विश्वास हो गया है कि वे इनके गुण गाते नहीं थकते तो क्यों नहीं वे इसको ग्रहण कर लेते?
2 अप्रैल के भाषण में मौ- नसीरुद्दीन अहमद ने तलाक के विरुद्ध और संयुक्त परिवार प्रथा के समर्थन में बहुत कुछ कहा। ऐसा ही पं- लक्ष्मीकांत और अजमेर के पं- मुकुट बिहारीलाल भार्गव ने भी कहा। संयुक्त परिवार प्रथा का प्राय: लोप ही होता जा रहा है। वर्तमान नियमों के अनुसार परिवार का कोई भी सदस्य साधारण पत्रदि द्वारा प्रार्थना करके भी उसके पृथक् हो सकता है । भारतीय न्यायालयों और प्रिवीकाैंसिल के निर्णय संयुक्त परिवार के सदस्यों के इस अधिकार का स्वीकृत करने के पक्ष में हैं। पुराने और नये विचार वाले लोगों के रहन-सहन आचार-विचारादि में भेद इतना बढ़ गया है तथा अन्य भी अनेक ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं जिनमें संयुक्त परिवार प्रथा स्वयमेव नष्टप्राय हो चुकी है और प्रतिदिन होती जा रही है किन्तु मैं उनके नियम में लिखने की कोई आवश्यकता नहीं समझता। मैं तो इस बात पर शास्त्रें की दृष्टि से कुछ प्रकाश डालना चाहता हूं जिनके नाम की दुहाई हमारे पौराणिक भाई और मौ- नसीरुद्दीन अहमद जैसे उनके वकील देते हैं। पाठक महानुभाव स्मृतियों के निम्न वचनों पर गम्भीरता से निष्पक्ष होकर विचार करें।
(1) मनुस्मृति 9/111 में लिखा है:µ
एवं सह वसेयुर्वा, पृथग् वा धर्म काम्यया।
पृथग् विवर्धते धर्म: तस्माद धर्म्मा पृथक क्रि या ।।
अर्थात् इस प्रकार भाई साथ रहें अथवा अलग अलग रहें यह उनकी इच्छा पर निर्भर है। पर अलग-अलग रहने से धर्म की वृद्धि होती है इसलिए अलग-अलग रहकर कर्म करना धर्म-सम्मत है। इसकी व्याख्या में कुल्लूक भट्ट ने लिखा है कि "एवम् अविभक्ता भ्रातर: सह वसेयु: यदि वा धर्मकामनया कृतविभागा: पृथग् वसेयु: यस्मात् पृथगवस्थाने सति पृथग-पृथग महायज्ञाद्यनुष्ठानधर्मस्तेषां विवर्धते तस्माद विभागक्रिया धर्मार्था।" अर्थात् इस प्रकार भाई अविभक्त रह कर साथ रहें अथवा