1370 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
धर्म की कामना से विभाग (बंटवारा) करके अलग-अलग रहें, क्योंकि अलग-अलग रहने पर पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान अलग-अलग होने से धर्म बढ़ता है। इसलिए विभाग किया अर्थात् बंटवारा करके अलग-अलग क्रिया करना धर्म के अनुुकूल है ।
मेधातिथि ने भी इस श्लोक की ऐसी ही व्याख्या करके यहां तक लिखा है कि "यस्तु जीवत्पेध पितरि कृतविवाहस्तदैव परिगृहीताग्निस्तस्यांधिकृततत्वान्नैवा — विभाग: नहि विभागाधि भागयोर्धर्माधमंत्वं स्वरुपेणास्तीतयुक्तम्।।"
(मनुस्मृति, मेधातिथिभाष्य, 2य भाग, कलकत्ता संस्करण पृ- 273)
अर्थात् जो पिता के जीवित होते हुए विवाह कर लेता है और तब गृह्याग्नि का ग्रहण करता है उसका संयुक्त परिवार से विभाग (पृथक् हो जाना) अनिवार्य या अत्यावश्यक है। परिवार के सदस्यों के विभाग होने या न होने में कोई धर्म या अधर्म नहीं है, यह हम बता चुके हैं।
(2) बृहस्पति स्मृति में इस विषय में कहा गया है :µ
एकपाकेन वसतां, पितृदेवार्चनादियम् । एकं भवोद्विभक्तानां, तदेवस्याद् गृहे गृहे।।
(बृहस्पति स्मृति 26/5 पृ- 96 बड़ौदा संस्करण)
अर्थात भाई इत्यादि यदि इकट्ठे रहें और एक स्थान पर भोजन खाएं तो पितृयज्ञ, देवयज्ञादि एक ही हो सकता है किन्तु यदि वे विभक्त हो अलग-अलग रहें तो ये यज्ञ प्रत्येक घर में होते हैं इसलिए विभक्त होकर रहना ही अधिक अच्छा है।
(3) गौतम धर्म सूत्र 284 में भी इसी बात को लेके छोटे से सूत्र द्वारा प्रकट किया गया है जो निम्नलिखित है:µ
‘विभागे तु धर्मवृद्धि:µ
अर्थात् संयुक्त परिवार की अपेक्षा उससे विभक्त हो जाने पर धर्म की वृद्धि होती है।
इसी प्रकार के वचन अन्य भी ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं कितु इतने ही उन लोगों के वचन को आयथार्थ सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं । जो संयुक्त परिवार की प्रथा को प्राचीन आर्य हिन्दू धर्म और संस्कृति का अनिवार्य या अत्यावश्यक अंग मान कर उसके भंग को अधर्म्य समझते हैं। वास्तव में धर्म की दृष्टि से बात इससे ठीक विपरीत है । हां, यह तो आवश्यक धर्म है कि सबका परस्पर प्रेम और पूर्ण सहानुभूति हो, किसी प्रकार का विरोध भाव न हो। अथर्ववेद 3/30 में ऐसा ही आदेश है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमिव:। अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सजार्तामिवाध्या ।।
अर्थात् मैं तुम्हारे अंदर हृदय और मन की एकता और अद्वेष भाव को स्थापित करता हूं।
तुम आपस में ऐसा प्रेम रखो जैसा गाय नवजात बछड़े के प्रति रखती है।
व्यावहारिक दृष्टि से संयुक्त परिवार प्रथा के पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, कितु मैं उस विषय में लिखना यहां आवश्यक नहीं समझता। वैयक्तिक शक्तियों का विकास, स्वावलम्बनादि गुणों की वृद्धि रहने में अधिक हो सकती है ऐसा लोगों का प्राय: अनुभव है। सम्बन्धियों तथा अन्यों के प्रति दया और सहानुभूति प्रदर्शित करना तो प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है ही। धार्मिक दृष्टि से इतना निर्देश ही पर्याप्त है।
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