Hindu Code Bill and its purpose—By Dharmadeo Vidyavachaspati in Hindi - Page 594

ANNEXURE II 1371

(हिन्दू कोड बिल पर कुछ विचार-13)

हिन्दू कोड बिल की आवश्यकता

पं- धर्मदेव विद्यावाचस्पति
गत लेख में मैंने संयुक्त परिवार प्रथा के सम्बन्ध में धार्मिक दृष्टि से कुछ प्रकाश डाला था। जन्मजात अधिकार की सम्पत्ति के विषय में विशेष लिखने की आवश्यकता मैंने नहीं समझी । हम वैदिकधर्मी तो जन्मसिद्ध अधिकार किसी विषय में भी नहीं मानते, "अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते स भ्रातरो वावृधु: सौभगाय । युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुधा वृश्नि: सुदिना मरुद्भ्य: ।।" (ऋग्वेद 5/625)
इत्यादि मन्त्रें में मनुष्यमात्र की भ्रातृता तथा समानता का तात्ति्वक दृष्टि से प्रतिपादन करते हुए जन्मसिद्ध अधिकार का निराकरण किया गया है । बोद्ध, जैन, सिक्ख आदि मतानुयायी भी समानता के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं जिससे जन्मसिद्धधिकार का समर्थन नहीं होता। महर्षि दयानन्द तो यहां तक बढ़ गए हैं कि उन्होंने केवल गुण-कर्म-स्वभाव पर आश्रित वर्णव्यवस्था के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए सत्यार्थप्रकाश में स्पष्ट लिखा है कि :µ
"न किसी की सेवा का भंग और न वंशच्छेदन होगा क्योंकि उनको अपने लड़के लड़कियों के बदले स्ववर्ण के योग्य दूसरे सन्तान विद्यासभा और राजसभा की व्यवस्था से मिलेंगे इसलिए कुछ भी अव्यवस्था न होगी ।" मिताक्षरा और दायभाग के अन्तर के विस्तार में जाना इस लेख में संभव नहीं किन्तु इस विषय में पटना के एक विद्वान रिटायर्ड सबजज ने हिन्दू ला कमेटी के सम्मुख साक्षी देते हुए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और युक्तिसंगत बात अपने अनुभव के आधार पर कही जिसका उल्लेख मुझे यहां उचित प्रतीत होता है । उन्होंने कहा कि "मिताक्षरा की अपेक्षा दायभाग अधिक उपयुत्तफ़ है । मैं संयुक्त परिवार प्रथा, पुत्र के जन्मजन्य अधिकारादि को समाप्त करने के पक्ष में हूं । मैं देखता हँू कि बिहार में धनी परिवारों के बालक आलसी होते हैं क्योंकि सम्पत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है जब कि बंगाल मे जहां दायभाग के अनुसार नियम प्रचलित है, बालक कर्मशील और साहसी होते हैं क्योंकि उन्हें धनी परिवार में जन्म लेने के ही कारण कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता ।"
(देखो हिन्दू ला कमेटी पृ- 154)
पिता, पितामह के ऋण की नैतिक उत्तरदायिता से पुत्र, पौत्रदि को मुक्त करने की बात जो पूर्वोद्धृत धारा 88 में कही गई है युक्तियुक्त तथा न्यायसंगत प्रतीत होती है।
जहां तक सर्वसामान्य हिन्दू कोड बिल की आवश्यकता व उपयोगिता का प्रश्न है, मेरा विश्वास है कि किसी भी संगठन प्रेमी समाजहितैषि का इस विषय में मतभेद होना असम्भवप्राय है। अब अधिकतर स्थानीय व प्रांतीय रूिढ़यों व रीतिरिवाजों के विधान (कानून) का स्थान