1372 DR. BABASAHEB AMBEDKAR : WRITINGS AND SPEECHES
ले रक्खा है । ‘रूढि: शास्त्रद् बलीयसी :’ इस हानिकारिका और संगठन तथा एकता में बाधिका उक्ति ने कि रूिढ़ शास्त्र से भी अधिक प्रवल होती है, हिन्दु समाज को जीर्णशीर्ण बना दिया है । कानून का निश्चय करने में भी इसके कारण बड़ी कठिनाई होती है, और न्यायालयों के परस्पर विरुद्ध निर्णय के कारण धन और शक्ति का बड़ा अपव्यय होता है अत: एक सर्वसामान्य हिन्दू कोड का होना प्रत्येक दृष्टि से वांछनीय है । महर्षि दयानन्द ने स्वराज्य के महत्व को "कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है, अथवा मतमतान्तर के आग्रह रहित, अपने पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और अन्याय के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।" इन शब्दों में दिखाते हुए लिखा "परन्तु भिन्न-भिन्न भाषा, शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का विरोध छूटना अति दुष्कर है । बिना इसके छूटे परस्पर का पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है ।"
(सत्यार्थप्रकरण 8 में सूत्र)
मुझे इसमें सन्देह प्रतीत नहीं होता है कि हिन्दू कोड अलग अलग व्यवहारादि जन्म विषमता को दूर करने में सहायक होगा अत: यह उपयोगी है । केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं, सभी भारतीयों के लिए एक सर्वसामान्य व्यवहार संहिता (कोड) बनाई जाय इस मांग में मुझे कोई बुराई प्रतीत नहीं होती पर उसमें अधिक समय लगेगा । उससे पूर्व हिदुओं के संगठन को दृढ़ करने तथा सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए हिन्दू कोड की भी उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता । मौलाना नसीरुद्दीन अहमद जैसे व्यक्ति जो कट्टर मुस्लिम लीगी रहे हैं और जिनकी मनोवृत्ति मे अब विशेष परिवर्तन हो गया है, ऐसा मानने का हमें कोई प्रमाण नहीं मिलता, यदि इस दृष्टि से भी हिन्दू कोड का विरोध कर रहे हैं तो कोई आश्चर्य की बात न होगी अन्यथा उनका इससे कोई सम्बन्ध तो नहीं जिससे सात-सात घण्टे भाषण की उन्हें आवश्यकता प्रतीत हो ।
यह कहना कि वर्तमान संविधान सभा के सदस्यों को ऐसे बिल को बनने व स्वीकृत करने का अधिकार नहीं हमें युक्तिसंगत प्रतीत होती । यदि सभा विधान बनाने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य को करने का अधिकार रखती है तो उसे हिन्दू कोड बिल जैसे उपयोगी बिल को बनाने व उसे पास करने के अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है विशेषत: जब कि संविधान सभा एक सर्वाधिकार सम्पन्न स्वतन्त्र संस्था मानी जा चुकी है । हां, इतनी बात अवश्य न्यायसंगत और युक्तियुक्त है कि हिन्दू कोड बिल जैसे बिल पर सम्मति देने का अधिकार केवल हिन्दू सदस्यों को ही हो अन्यों को नही क्योंकी अहिंदुओं का इससे कोई सम्बन्ध नहीं । जैसा कि मैने एस लेखमाला में शास्त्रीय और व्यावहारिक दृष्टि से प्रस्तुत हिन्दू कोड बिल की भिन्न-भिन्न मुख्य धाराओं पर प्रकाश डालते हुए बताया है एक विवाह, अन्तर्जातीय विवाह समर्थन, स्ति्रयों की दशा को उन्नत इत्यादि विषयक इसके प्राधान प्रशंसनीय है । विवाह की आयु, पुत्रियों के दायभाग में अधिकार तथा अन्य विषयों में संशोधनों की आवश्यकता है । वर-वधू के लिए न्यूनतम आयु 24 वर्ष और 16