2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 103

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बंधन तोड़ देते हैं, लेकिन फिर भी वे अपने शेष जीवन में जाति - व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास करते रहते हैं। यदि इस घटना की व्याख्या की जाए तो ज्ञात होगा कि हिन्दुओं की तर्क शक्ति पर एक और नियंत्रण है। मनुष्य का जीवन सामान्यतः आभ्यासिक तथा अचिंतनशील होता है। किसी धर्म, विश्वास या ज्ञान के कल्पित रूप के संबंध में सक्रिय, संगत एवं श्रमसाध्य विचार की दृष्टि से (उसके समर्थक आधार तथा संभावित निष्कर्षों के परिप्रेक्ष्य में) चिंतनशील विचार यदा - कदा और केवल धर्मसंकट में किया जाता है। किसी हिन्दू के जीवन में रेल यात्राएं और विदेश यात्राएं वास्तव में ऐसे ही धर्मसंकट होते हैं। ऐसे अवसरों पर किसी हिन्दू से यह आशा करना स्वाभाविक है कि वह अपने आपसे यह पूछे कि जब वह सदैव जाति - व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता तो वह जाति - व्यवस्था को मानता ही क्यों है। लेकिन वह यह प्रश्न अपने आपसे नहीं करता है। वह एक कदम पर जातपांत को तोड़ देता है और दूसरे कदम पर कोई प्रश्न उठाए बिना उसका पालन करने लगता है। ऐसा आश्चार्यजनक आचरण करने का कारण शास्त्रों के नियम में मिलेगा जो उसे यह निर्देश देता है कि उसे यथासंभव जाति - व्यवस्था का पालन करना चाहिए और पालन न करने की स्थिति में उसे प्रायश्चित करना चाहिए। प्रायश्चित के इस सिद्धांत के अनुसार शास्त्रों ने समझौते वाली भावना का पालन करते हुए जाति - व्यवस्था को हमेशा के लिए जीवनदान दे दिया और चिंतनशील विचारों की अभिव्यक्ति को दबा दिया, क्योंकि ऐसा न करने पर जाति - व्यवस्था की धारणा नष्ट हो सकती थी।

ऐसे अनेक समाज सुधारक हुए हैं, जिन्होंने जातिप्रथा तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन करने के लिए कार्य किया है। उनमें रामानुज, कबीर आदि प्रमुख हैं। क्या आप इन समाज सुधारकों के कार्यों का समर्थन कर सकते हैं और हिन्दुओं को उपदेश दे सकते हैं कि वे उनका पालन करें? यह सच है कि मनु ने श्रुति और स्मृति के साथ अनुशास्ति के रूप में सदाचार को भी शामिल कर दिया है। वास्तव में सदाचार को शास्त्रों के अपेक्षाकृत उच्च स्थान प्रदान किया गया है :

यद्यद्दाचर्यते येन धम्यं वाऽधर्म्यमेव वा।

देशस्याचरणं नित्यं चरितं तद्धिकीर्तितम्।।

सदाचार - भले ही शास्त्रों के अनुसार धर्म्य या अधर्म्य हो या शास्त्रों के प्रतिकूल हो, लेकिन उसका पालन करना होगा। सदाचार का अर्थ क्या है? यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि सदाचार का अर्थ किसी भले या धार्मिक व्यक्ति के उचित या नेक कार्यों से है तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती होगी। सदाचार का अर्थ नेक कार्यों या नेक व्यक्ति के कार्यों से नहीं है। इसका अर्थ अच्छी या बुरी - प्रचान प्रथा से है। यह बात निम्नलिखित श्लोक में स्पष्ट की गई है :

यस्मिन् देशे य आचारः पारंपर्यक्रमागतः।

वर्णानां किल सर्वेषां स सदाचार उच्यते।।

लोगों को इस विचार के विरुद्ध चेतावनी देने के लिए कि सदाचार का अर्थ नेक