जातिप्रथा - उन्मूलन
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कार्यों या नेक व्यक्ति के कार्यों से नहीं है और इस बात की आशंका करते हुए कि लोग इसका अर्थ वैसा ही समझ सकते हैं और नेक व्यक्तियों के कार्यों का अनुसरण कर सकते हैं, स्मृतियों में हिन्दुओं को स्पष्ट आज्ञा दी गई है कि वे नेक कार्यों के लिए देवताओं का भी अनुसरण न करें, यदि वे श्रुति, स्मृति और सदाचार के प्रतिकूल हैं। इसे आप चाहे असाधारण या अत्यंत विकृत विचार कह सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ‘न देव चरितं चरेत्‘ एक निषेधाज्ञा है, जो हिन्दुओं को उनके शास्त्रों द्वारा दी गई है। किसी भी सुधारक के शास्त्रागार में तर्क और नैतिकता - दो ही शक्तिशाली हथियार होते हैं। यदि उससे ये दोनों हथियार छीन लिए जाएं तो वह कार्य करने में असशक्त हो जाएगा। आप जाति - व्यवस्था को कैसे समाप्त कर पाएंगे, जब लोगों को यह सोचने की स्वतंत्रता नहीं है कि क्या यह नैतिकता के अनुकूल है? जाति - व्यवस्था के चारों तरफ बनाई गई दीवार अभेद्य है और जिस सामग्री से इसका निर्माण किया गया है, उसमें तर्क और नैतिकता जैसी कोई ज्वलनशील वस्तु नहीं है। इसी दीवार के पीछे ब्राह्मणों की फौज
खड़ी है - उन ब्राह्मणों की जो एक बुद्धिजीवी वर्ग हैं, उन ब्राह्मणों की जो हिन्दुओं के प्राकृतिक नेता हैं, उन ब्राह्मणों की जो वहां मात्र भाड़े के सैनिकों के रूप नहीं हैं, बल्कि अपने देश के लिए लड़ती हुई सेना के रूप में हैं। अब आप समझ गए होंगे कि मैं ऐसा क्यों सोचता हूं कि हिन्दुओं की जातिप्रथा को समाप्त करना प्रायः असंभव है। बहरहाल, इसे समाप्त करने से पहले कई युग बीत जाएंगे। चाहे कार्य करने में समय लगता है या चाहे उसे तुरंत किया जा सकता है, लेकिन आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि आप जातिप्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगाना होगा, क्योंकि वेद और शास्त्र किसी भी तर्क से अलग हटाते हैं और वेद तथा शास्त्र किसी भी नैतिकता से वंचित करते हैं। आपको ‘‘श्रुति‘ और ‘स्मृति‘ के धर्म को नष्ट करना ही चाहिए। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। यही मेरा सोचा - विचारा हुआ विचार है।
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कुछ लोग नहीं समझ सकते कि धर्म के विनाश से मेरा आशय क्या है; कुछ को यह धारणा विद्रोही लग सकती है और कुछ को यह क्रांतिकारी विचार लग सकता है। इसलिए मैं अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि क्या आप सिद्धांतों और नियमों में भेद करते हैं या नहीं। लेकिन मैं इनके बीच भेद मानता हूं। मैं न केवल इनको अलग - अलग मानता हूं, बल्कि यह भी मानता हूं कि इनमें भेद वास्तविक और महत्वपूर्ण है। नियम व्यावहारिक होते हैं इनके निर्धारित मानदंड के अनुसार काम करने के प्रथागत रास्ते हैं। परंतु सिद्धांत बौद्धिक होते हैं, ये चीजों को परखने के उपयोगी साधन हैं। ये नियमकर्ता को बताते हैं कि किसी कार्य को करने के लिए कौन सी कार्यविधि अपनाई जाए। सिद्धांत कोई निश्चित कार्यविधि निर्धारित नहीं करते। नियम खाना बनाने की विधि की तरह बताते