2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 105

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हैं कि क्या किया जाए और कैसे किया जाए। सिद्धांत, जैसे न्याय के सिद्धांत प्रमुख शीर्ष बताते हैं, जिसके संदर्भ में उसे अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों के दिशाकोण पर विचार करना होता है, ये उसे सुझाव देकर उसका मार्गदर्शन करते हैं कि उसे किन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए। नियम और सिद्धांतों का भेद उसके किए गए कार्य के गुण और विषय - वस्तु से अंतर स्पष्ट हो जाता है। कोई अच्छा कार्य करना जिसे नियम अच्छा मानते हैं, तथा सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में अच्छा कर्म करना, दो अलग - अलग बाते हैं। सिद्धांत गलत भी हो सकता है, लेकिन इसके अंतर्गत किया गया कर्म सचेतन होता है और इसका एक उत्तरदायित्व होता है। नियम सही हो सकता है और इसके अंतर्गत किया गया कर्म मशीनी होता है। कोई धार्मिक कर्म सही कर्म न भी हो किन्तु इस कर्म का एक उत्तरदायित्व होता है। इस उत्तरदायित्व के कारण धर्म केवल सिद्धांतों पर आधारित होता है। यह नियमों का विषय नहीं हो सकता जिस क्षण सिद्धांत विकृत होकर नियम में बदल जाता है, उसी समय यह धर्म नहीं रह जाता क्योंकि वह उत्तरदायित्व को समाप्त कर देता है जो वास्तविक धार्मिक कर्म का सार होता है। हिन्दू धर्म क्या है? क्या वे सिद्धांतों का समूह है या नियम - संहिता? वेदों और स्मृतियों में वर्णित हिन्दू धर्म कुछ भी नहीं है, यह केवल बलि, सामाजिक, राजनैतिक तथा स्वच्छता के नियम और विनियमन का मिलाजुला पुंज है। हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह और कुछ भी नहीं केवल आदेशों तथा निषेधाज्ञों का पुलिंदा है। आध्यात्मिक सिद्धांतों के रूप मेंं धर्म यथार्थ में सार्वभौमिक होता है, जो सारी प्रजातियों और देशों पर हर काल में समान रूप से लागू होता है। ये तत्व हिन्दू धर्म में विद्यमान नहीं हैं और यदि हैं भी तो ये हिन्दू के जीवन को संचालित नहीं करते। हिन्दू के लिए ‘धर्म‘ शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से आदेशों और निषेधाज्ञों से है और धर्म शब्द वेदों और स्मृतियों में इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा ऐसा ही टीकाकारों द्वारा समझा गया है। वेदों में प्रयुक्त ‘धर्म‘ शब्द का तात्पर्य धार्मिक अध्यादेशों या अनुष्ठानों से है। वहां तक कि जेमिनी ने अपनी ‘पूर्व मीमांसा‘ में धर्म की परिभाषा इस प्रकार की है, ‘‘एक इच्छित लक्ष्य या परिण् ाम जो आदेशार्थ है। जिसे वैदिक परिच्छेदों में बताया गया है।‘‘ सरल और सीधी भाषा में कहा जाए तो हिन्दू ‘धर्म‘ को कानून या अधिक से अधिक कानूनी वर्ग - नीति मानते हैं। स्पष्ट रूप से कहा जाए तो मैं इस अध्यादेशीय संहिता को ‘धर्म‘ मानने से इन्कार करता हूं। गलत रूप से धर्म कही जाने वाली इस अध्यादेशीय संहिता की पहली बुराई यह है कि यह नैतिक जीवन की स्वतंत्रता और स्वेच्छा से वंचित करती है तथा बाहर से थोपे गए नियमों द्वारा चिंतित और चाटुकार बना देती है। इसके अंतर्गत आदर्शें के प्रति निष्ठा नहीं है, केवल आदेशों का पालन ही आवश्यक है। इस अध्यादेशीय संहिता की सबसे बड़ी बुराई यह है कि इसमें वर्णित कानून कल, आज ओर हमेशा के लिए एक ही हैं। ये कानून असमान हैं तथा सभी वर्गों पर समान रूप से लागू नहीं होते। इस असमानता को चिरस्थायी बना दिया गया है क्योंकि इसे सभी पीढि़यों के लिए एक ही प्रकार से लागू किया गया है। आपत्तिजनक बात यह नहीं है कि इस संहिता को किसी पेगम्बर या कानूनदाता कहे जाने