जातिप्रथा - उन्मूलन
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वाले महान व्यक्ति ने बनाया है। आपत्तिजनक बात यह है कि इस संहिता को अंतिमता व स्थिरता प्रदान की गई है। मन की प्रसन्नता किसी व्यक्ति की अवस्थाओं तथा परिस्थितियों के अनुर बदलती रहती है। मन की प्रसन्नता अलग - अलग व्यक्तियों के लिए अलग - अलग काल में भी बदलती रहती है। इस स्थिति में मानवता कब तक शिकंजे में जकड़े और अपंग बने रहकर इस बाहरी कानून की संहिता को सहन कर सकती है? इसलिए यह कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है कि ऐसे धर्म को नष्ट किया जाना चाहिए तथा ऐसे धर्म को नष्ट करने का कार्य अधर्म नहीं कहलाएगा। वास्तव में, मैं कहता हूं कि आपका परम कर्तव्य यह है कि आप इस मुखौटे को उतार दो जो गलत रूप से कानून को धर्म बताता है। आपके लिए यह एक आवश्यक कार्य है। एक बार आप लोगों को साफ - साफ बता देते हैं कि यह धर्म, धर्म नहीं है, यह वस्तुतः एक कानून है। तब आप यह कहने की स्थिति में होंगे कि इसमें संशोधन किया जाए या इसे समाप्त किया जाए। जब तक लोग इसे धर्म मानते रहेंगे, तब तक वे इसमें संशोधन के लिए तैयार नहीं होंगे, क्योंकि यदि आमतौर पर कहा जाए तो धर्म को बदल डालने का विचार मान्य नहीं होता है। लेकिन कानून की धारणा बदलाव की धारणा से जुड़ी होती है और जब आप समझ जाते हैं कि यह धर्म एक पुराना तथा पुरातत्वीय है, तब तो इसे बदलने के लिए तैयार हो जाएंगे क्योंकि लोग जानते हैं कि कानून बदला जा सकता है।
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यद्यपि मैं धर्म के नियमों की निंदा करता हूं, इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि धर्म की आवश्यकता ही नहीं। इसके विपरीत मैं बर्क के कथन के सहमत हूं, जो कहता है : ‘‘सच्चा धर्म समाज की नींव है, जिस पर सब नागरिक सरकारें टिकी हुई हैं।‘‘
परिणामतः जब मैं यह अनुरोध करता हूं कि जीवन के ऐसे पुराने नियम समाप्त कर दिए जाएं, जब मैं यह देखने का उत्सुक हूं कि इसका स्थान ‘धर्म के सिद्धांत‘ ले लें, तभी हम दावा कर सकते हैं कि यही सच्चा धर्म है। वास्तव में, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि धर्म आवश्यक है। इसलिए मैं आपको कहना चाहता हूं कि धर्म में सुधार को मैं एक आवश्यक पहलू मानता हूं। मेरे विचार से धर्म में सुधार के मूलभूत मुद्दे इस प्रकार है : (1) हिन्दू धर्म की केवल एक और केवल एक ही मानक पुस्तक होनी चाहिए, जिसे सारे के सारे हिन्दू स्वीकार करें और मान्यता दें। इससे वस्तुतः मेरा तात्पर्य यह है कि वेदों, शास्त्रों और पुराणों को पवित्र और अधिकृत ग्रंथ मानने पर रोक लगे तथा इन ग्रंथों में निहित धार्मिक या सामाजिक मत का प्रवचन करने पर सजा का प्रावधान हो, (2) अच्छा होगा यदि हिन्दुओं में पुरोहिताई समाप्त की जाए। चूंकि ऐसा होना असंभव है, इसलिए पुरोहिताई पुश्तैनी नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति जो अपने को हिन्दू मानता है, उसे राज्य के द्वारा परीक्षा पास कर सनद प्राप्त कर लेने पर पुजारी बनने का अधिकार होना चाहिए, (3) बिना सनद के धर्मानुष्ठान करने को कानूनन वैध नहीं माना जाना