90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
चाहिए। जिनके पास सनद नहीं है, उनके द्वारा पुजारी का काम किए जाने पर सजा का प्रावधान हो, (4) पुजारी एक सरकारी नौकर होना चाहिए, जिसके ऊपर नैतिकता, आस्था तथा पूजा के मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सके। इसके अलावा उस पर नागरिक कानून भी लागू होने चाहिएं, और (5) पुजारियों की संख्या को कानून द्वारा आवश्यकता के अनुरूप सीमित किया जाना चाहिए, जैसा कि आई सी एस के पदों की संख्या के बारे में किया जाता है। कुछ लोगों के लिए यह सुझाव अति सुधारवादी लग सकता है। लेकिन इसे मैं क्रांतिकारी कदम नहीं मानता हूं। भारत में प्रत्येक व्यवसाय का नियमन किया गया है। जैसे इंजीनियर द्वारा योग्यता दर्शाई जानी चाहिए। डाक्टर द्वारा योग्यता दर्शाई जानी चाहिए। वकील द्वारा भी योग्यता दशाई जानी चाहिए, इससे पहले कि वे अपने पेशे को अपनाएं। अपने पेशे के संपूर्ण समय के दौरान वे न केवल नागरिक और आपराधिक कानून मानने के लिए बाध्य हैं, बल्कि संबंधित पेशे में नैतिकता की विशेष आचार - संहिता भी मानने को वे बाध्य हैं। केवल पुजारी का ही पेशा ऐसा है, जिसमें योग्यता दर्शाने की आवश्यकता नहीं है। हिन्दू पुजारी का ही केवल ऐसा पेशा है, जिसके लिए कोई आचार - संहिता निर्धारित नहीं है। मानसिक रूप से पुजारी मुर्ख हो सकता है, शारीरिक रूप से वह किसी खराब बीमारी, जैसे सूजाक या सिफलिस से ग्रसित हो सकता है और नैतिक रूप से वह अधर्मी हो सकता है। इसके बावजूद वह पुण्य अनुष्ठान कर सकता है, हिन्दू मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है तथा हिन्दू देवताओं की पूजा कर सकता है। इसके लिए एक ही शर्त है कि वह पुरोहित की जाति में पैदा हुआ हो। यह सब घृणास्पद है और यह सब इस कारण है कि हिन्दू पुजारी पर न तो कोई काननू लागू है और न ही कोई नैतिकता की आचार - संहिता। इनके लिए कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं है। केवल अधिकार और सुविधाएं इन्हें मिली हुई हैं। यह एक ऐसी बला है, जिसे देवतागणों ने समाज के मानसिक तथा नैतिक पतन के लिए लाद दिया है। जैसा कि मैंने उससे पूर्व उल्लेख किया है, पुरोहित वर्ग को विधेयक द्वारा नियंत्रण में लिया जाना चाहिए। इससे लोगों का अनिष्ट करने और उन्हें गुमराह करने पर रोक लगेगी। इसमें पुरोहिताई प्रजातांत्रिक संस्था बन जाएगी तथा पुरोहित बनने के अवसर सभी के लिए खुल जाएंगे। इस प्रकार ब्राह्मणवाद को मारने में मदद मिलेगी और जातियों की समाप्ति के लिए भी मदद मिलेगी, जो ब्राह्मणवाद की ही देन है। ब्राह्मणवाद ऐसा जहर है, जिससे हिन्दूवाद
खराब हुआ है। ब्राह्मणवाद को मारने के बाद ही आप हिन्दूवाद को बचाने में सफल हो पाएंगे। किसी भी ओर से इन सुधारों का विरोध नहीं होना चाहिए। आर्य समाजियों द्वारा भी इन सुझावों का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके द्वारा अपनाए गए सिद्धांत ‘गुणकर्म‘ के अनुरूप है।
चाहे आप ऐसा करें या न करें, आपको अपने धर्म को एक नया सैद्धांतिक आधार देना होगा, जो स्वतंत्रता, समानता और भाई - चारे के, संक्षेप में, प्रजातंत्र के अनुरूप हो। मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन मुझे बताया गया है कि ऐसे धार्मिक सिद्धांत जो