2. जातिप्रथा-उन्मूलन - Page 108

जातिप्रथा - उन्मूलन

91

स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के अनुरूप हों, उन्हें विदेश से लाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के सिद्धांत उपनिषदों में वर्णित हैं। आप चाहें तो पूरा ढांचा बदले बिना कच्ची धातु की यथेष्ट कटाई - छटाई करके यह किया जा सकता है, जो मेरे कथन से अधिक है। इसका तात्पर्य है कि जीवन की मूलभूत धारणाओं को पूरी तरह बदला जाए। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य और चीजों के प्रति दृष्टिकोण तथा रवैये में पूरा बदलाव लाया जाए। इसका अर्थ है ‘धर्म - परिवर्तन‘ परंतु यदि आप इस शब्द को पसंद नहीं करते तो मैं कहूंगा इसका अर्थ है - नया जीवन। लेकिन एक नया जीवन मृत शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता। नया जीवन केवल नए शरीर में ही प्रवेश कर सकता है। इससे पहले कि नया शरीर अस्तित्व में आए और उसमें नया जीवन प्रवेश कर सके, पुराने शरीर को हर हालत में मरना चाहिए। साधारण शब्दों में, इससे पहले कि नया जीवन डाला जाए और उसमें स्पंदन हो, पुराने ढर्रे को समाप्त होना चाहिए। यही मेरे कहने का अर्थ है, जब मैंने कहा था कि शास्त्रों की सत्ता को हटाओं और शास्त्रों का धर्म नष्ट कर दो।

25

मैंने आपको बहुत देर तक बिठाकर रखा है। अब समय आ गया है कि मैं अपना भाषण समाप्त करूं। यह एक सुविधाजनक बिंदु है, जहां मुझे रूक जाना चाहिए। लेकिन संभवतः हिन्दू श्रोताओं के बीच में ऐसे विषय पर मेरा अंतिम भाषण है, जो विषय हिन्दुओं के लिए प्राणाधार है। इससे पहले कि मैं भाषण देना बंद करूं, मैं हिन्दुओं के सामने ऐसे प्रश्न रखना चाहता हूं, जिसको मैं अति महत्वपूर्ण समझता हूं और मैं उन्हें उन पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता हूं।

सबसे पहले हिन्दुओं को विचार करना चाहिए कि क्या वे आस्था, आदतें, नैतिकता और जीवन के प्रति धारणा के बारे में नृजाति - विज्ञानियों के शांतिपूर्ण दृष्टिकोण को मानना काफी मानते हैं जो संसार के अलग - अलग लोगों में भिन्न - भिन्न रूप में पाए जाते हैं, या यह क्या आवश्यक नहीं है कि यह पता लगाने का प्रयास किया जाए कि संसार में किस प्रकार की नैतिकता, आस्था तथा दृष्टिकोण रखने वालो लोग पनपे हैं, मजबूत हुए हैं तथा उन्होंने इस पृथ्वी पर राज किया है। जैसाकि कि प्रोसेफर कारवर ने कहा है, ‘‘नैतिकता और धर्म जो नैतिक स्वीकृति और अस्वीकृति की संगठित अभिव्यक्ति है, अस्तित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण तत्व हैं जो आक्रमण और रक्षा के सच्चे हथियार, दांत और पंजे, सींग और

खुर, फर और पंख, अर्थात् सब कुछ हैं। सामाजिक समूह, समुदाय, आदिम निवासी या राष्ट्र जो नैतिकता की अव्यवहार्य योजनाएं विकसित कर लेते हैं या इनके अंतर्गत ऐसे सामाजिक कर्म विकसित कर लेते हैं जो उन्हें अस्तित्व के लिए कमजोर और अक्षम बनाते हैं, आदतन स्वीकृति की भावना पैदा करते हैं, जब कि वे सामाजिक कर्म जो उन्हें मजबूत और विस्तार के लिए समर्थ बनाते हैं, आदतन तिरस्कार की भावना पैदा करते हैं और अंततः अस्तित्व के संघर्ष में मिट जाते हैं। इन आदतों की स्वीकृति या अस्वीकृति ही (ये धर्म और नैतिकता के परिणाम हैं) इन्हें उसी प्रकार पंगु बना देती है, जिस प्रकार मक्षिका के एक